सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी । दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥ 28 ॥ सब जीव तोरैं राम सौं, पै राम न तोरे । दादू काचे ताग ज्यों, टूटै त्यों जोरे ॥ 29 ॥ सजीवन फूटा फेरि संवार कर, ले पहुँचावे ओर । ऐसा कोई ना मिलै, दादू गई बहोर ॥ 30 ॥ ऐसा कोई ना मिलै, तन फेरि संवारै । बूढे तैं बाला करै, खै काल निवारै ॥ 31 ॥ परच करूणा विनती गलै विलै कर बीनती, एकमेक अरदास । अरस परस करुणा करै, तब द्रवै दादू दास ॥ 32 ॥ साँईं तेरे डर डरूँ, सदा रहूँ भैभीत । अजा सिंह ज्यों भय घणा, दादू लिया जीत ॥ 33 ॥ पोख प्रतिपाल रक्षक दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार । दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥ 34 ॥ आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार । साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥ 35 ॥ सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल । सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥ 36 ॥ विनती सागर तरण दादू काया नाव समंद में, औघट बूड़े आइ । इहि अवसर एक अगाध बिन, दादू कौन सहाइ ॥ 37 ॥ यहु तन भेरा भौजला, क्यों कर लंघे तीर । खेवट बिन कैसे तिरै, दादू गहर गंभीर ॥ 38 ॥
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