सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम। लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥ अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार। जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥ तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार। दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥ सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ। कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥ संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ। भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥ परिचय करुणा विनती दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै। आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥ दया विनती दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे। सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥ विनती तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव। हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥ अनाथों का आसरा, निरधारों आधार। निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥ साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार। मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥ दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ। प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥
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