सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु । हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥ तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि । दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥ तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल । हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥ तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ । हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥ छिन बिछोह साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह । दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥ साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह । प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥ करुणा तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और । मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥ मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि । दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥ खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार । भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥ दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया । मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश- ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥
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