भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 293

श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 जिनकी रक्षा तूँ करै, ते उबरे करतार। जे तैं छाड़ै हाथ तैं, ते डूबे संसार ॥ 50 ॥ राखणहारा एक तूँ, मारणहार अनेक। दादू के दूजा नहीं, तूँ आपै ही देख ॥ 51 ॥ दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार। तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥ 52 ॥ जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार। तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥ 53 ॥ दया विनती दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार। कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥ 54 ॥ दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार। हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥ 55 ॥ दादू आत्म जीव अनाथ सब, करतार उबारै। राम निहोरा कीजिये, जनि काहू मारै ॥ 56 ॥ अर्श जमीं औजूद में, तहाँ तपै अफताब। सब जग जलता देख कर, दादू पुकारैं साध ॥ 57 ॥ सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ। पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥ 58 ॥ तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ। दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥ 59 ॥ विनती समर्थ धोरी कंध धर, रथ ले ओर निवाहि। मार्ग मांहि न मेलिये, पीछे बिड़द लजाहि ॥ 60 ॥ दादू गगन गिरै तब को धरै, धरती-धर छंडै। जे तुम छाड़हु राम रथ, कंधा को मंडै ॥ 61 ॥

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