सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 जिनकी रक्षा तूँ करै, ते उबरे करतार। जे तैं छाड़ै हाथ तैं, ते डूबे संसार ॥ 50 ॥ राखणहारा एक तूँ, मारणहार अनेक। दादू के दूजा नहीं, तूँ आपै ही देख ॥ 51 ॥ दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार। तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥ 52 ॥ जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार। तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥ 53 ॥ दया विनती दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार। कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥ 54 ॥ दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार। हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥ 55 ॥ दादू आत्म जीव अनाथ सब, करतार उबारै। राम निहोरा कीजिये, जनि काहू मारै ॥ 56 ॥ अर्श जमीं औजूद में, तहाँ तपै अफताब। सब जग जलता देख कर, दादू पुकारैं साध ॥ 57 ॥ सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ। पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥ 58 ॥ तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ। दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥ 59 ॥ विनती समर्थ धोरी कंध धर, रथ ले ओर निवाहि। मार्ग मांहि न मेलिये, पीछे बिड़द लजाहि ॥ 60 ॥ दादू गगन गिरै तब को धरै, धरती-धर छंडै। जे तुम छाड़हु राम रथ, कंधा को मंडै ॥ 61 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम। लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥ अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार। जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥ तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार। दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥ सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ। कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥ संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ। भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥ परिचय करुणा विनती दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै। आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥ दया विनती दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे। सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥ विनती तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव। हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥ अनाथों का आसरा, निरधारों आधार। निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥ साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार। मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥ दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ। प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु । हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥ तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि । दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥ तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल । हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥ तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ । हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥ छिन बिछोह साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह । दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥ साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह । प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥ करुणा तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और । मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥ मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि । दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥ खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार । भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥ दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया । मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश- ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥
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साक्षीभूत का अंग अथ साक्षीभूत का अंग ३५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ भ्रम विध्वंसन सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि । दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥ 2 ॥ मांही तैं मुझ को कहै, अन्तरजामी आप । दादू दूजा धंध है, साचा मेरा जाप ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35 कर्त्ता साक्षीभूत करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत। कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥ 4 ॥ दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल। तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥ 5 ॥ दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह। सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥ 6 ॥ स्वकीय मित्र-शत्रुता दादू जामण मरणा सान कर, यहु पिंड उपाया। साँईं दिया जीव को, ले जग में आया ॥ 7 ॥ दादू विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया। मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥ 8 ॥ दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे। जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजे ॥ 9 ॥ मन ही मांहीं ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि। साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 10 ॥ बुरा बला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि। दादू कर्त्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥ 11 ॥ साधु साक्षीभूत कर्त्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै। दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥ 12 ॥ दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जांहि। केई आइ पूजा करैं, केई खिलावैं खांहि ॥ 13 ॥ केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति मांहि। केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नांहि ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35 ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर । करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥ 15 ॥ करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद । दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥ 16 ॥ देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ । दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥ 17 ॥ कर्त्ता साक्षीभूत दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ । सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥ 18 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पैंतीसवां साक्षीभूत काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 35 ॥ साखी 18 ॥
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बेली का अंग अथ बेली का अंग ३६ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्त्वहि पोषै । सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥ 2 ॥ पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे । सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥ 3 ॥ दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ । सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36 जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ । दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥ 5 ॥ हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार । दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥ 6 ॥ दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ । आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥ 7 ॥ कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप । दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥ 8 ॥ जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ । दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥ 9 ॥ दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं । सूखै खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥ 10 ॥ दादू बहुगुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं । सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥ 11 ॥ बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि । मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥ 12 ॥ अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ । अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ 13 ॥ दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ । विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥ 14 ॥ सतगुरु संगति नीपजै, साहिब सींचनहार । प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फलै अपार ॥ 15 ॥ दया धर्म का रूंखड़ा, सत सौं बधता जाइ । संतोंष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36 इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य छत्तीसवां बेली काअंग सम्पूर्ण ।। अंग 36 ।। साखी 16 ।।
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अबिहड़ का अंग www.dadooram.org अथ अबिहड़ का अंग ३७ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ । ना वह मरै, न बीछूटै, ना दुख व्यापै कोइ ॥ 2 ॥ दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहि संसार । ना वह खिरै, न हम खपैं, ऐसा लेहु विचार ॥ 3 ॥ दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी । दादू जीवन-मरण का, सो सदा संगाती ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-अबिहड़ का अंग 37 दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ। आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥ 5 ॥ दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार। अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥ 6 ॥ दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार। आदि अंत बिहड़ै नहीं, बिनसै सब आकार ॥ 7 ॥ दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ। निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥ 8 ॥ दादू अबिहड़ आप है, कबहूँ बिहड़े नांहि। घटै बधै नहीं एक रस, सब उपज खपै उस मांहि ॥ 9 ॥ अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ। दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥ 10 ॥ अन्त समय की साखी जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन। साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥ 11 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सैंतीसवां अबिहड़ काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 37 ॥ साखी 11 ॥ साखी स्कन्ध पूर्वार्द्ध भाग समाप्त दादूराम सत्यराम
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दादूराम ॥ श्री परमात्मने नमः ॥ सत्यराम ॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ शब्द भाग (उत्तरार्ध) अथ राग गौड़ी १ (गायन समय दिन 3 से 6)
- स्मरण शूरातन नाम निश्चय । त्रिताल राम नाम नहीं छाडूं भाई, प्राण तजूं निक ट जीव जाई ॥ टेक ॥ रती रती कर डारै मोहि, साँई संग न छाडूं तोहि ॥ 1 ॥ भावै ले सिर करवत दे, जीवन मूरी न छाडूं तोहि ॥ 2 ॥ पावक में ले डारै मोहि, जरै शरीर न छाडूं तोहि ॥ 3 ॥ अब दादू ऐसी बन आई, मिलूं गोपाल निसान बजाई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 2. अन्य उपदेश । त्रिताल राम नाम जनि छाड़े कोई, राम कहत जन निर्मल होई ॥ टेक ॥ राम कहत सुख संपति सार, राम नाम तिर लंघे पार ॥ 1 ॥ राम कहत सुधि बुधि मति पाई, राम नाम जनि छाड़हु भाई ॥ 2 ॥ राम कहत जन निर्मल होई, राम नाम कहि कश्मल धोई ॥ 3 ॥ राम कहत को को नहिं तारे, यहु तत दादू प्राण हमारे ॥ 4 ॥ 3. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल मेरे मन भैया राम कहो रे । राम नाम मोहि सहज सुनावै, उनहीं चरण मन कीन रहो रे ॥ टेक ॥ राम नाम ले संत सुहावै, कोई कहै सब शीश सहो रे । वाही सौं मन जोरे राखो, नीके राशि लिये निबहो रे ॥ 1 ॥ कहत सुनत तेरो कछू न जावै, पापनि छेदन सोई लहो रे । दादू रे जन हरि गुण गावो, कालहि जालहि फेरि दहो रे ॥ 2 ॥ 4. विरह । एकताल कौण विधि पाइये रे, मीत हमारा सोइ ॥ टेक ॥ पास पीव, परदेश है रे, जब लग प्रकटै नांहि। बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन मांहि ॥ 1 ॥ जब लग नैन न देखिये, प्रकट मिलै न आइ। एक सेज संगहि रहै, यहु दुख सह्या न जाइ ॥ 2 ॥ तब लग नेड़ै दूर है रे, जब लग मिले न मोहि। नैन निकट नहीं देखिये, संग रहे क्या होइ ॥ 3 ॥ कहा करूँ कैसे मिले रे, तलफै मेरा जीव। दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 5. विरह विलाप । षटताल जियरा क्यों रहै रे, तुम्हारे दर्शन बिन बेहाल ॥ टेक ॥ परदा अंतर कर रहे, हम जीवैं किहिं आधार। सदा संगाती प्रीतमा, अब के लेहु उबार ॥ 1 ॥ गोप्य गुसांइ ह्रै रहे, अब काहे न प्रकट होइ। राम सनेही संगिया, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥ अन्तरयामी छिप रहे, हम क्यों जीवैं दूर। तुम बिन व्याकुल केशवा, नैन रहे जल पूर ॥ 3 ॥ आप अपरछन ह्रै रहे, हम क्यों रैनि बिहाइ। दादू दर्शन कारणै, तलफ तलफ जीव जाइ ॥ 4 ॥ 6. विरह हैरान । त्रिताल अजहूँ न निकसैं प्राण कठोर। दर्शन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर ॥ टेक ॥ चार पहर चारों युग बीते, रैनि गँवाई भोर। अवधि गई अजहूँ नहिं आये, कतहूँ रहे चित-चोर ॥ 1 ॥ कबहूँ नैन निरख नहिं देखे, मारग चितवत तोर। दादू ऐसे आतुर विरहनी, जैसे चंद चकोर ॥ 2 ॥ 7. सुन्दरी श्रृंगार सो-धन पीवजी साज सँवारी, अब वेगि मिलो तन जाइ बनवारी ॥ टेक ॥ साज श्रृंगार किया मन मांही, अजहूँ पीव पतीजै नांही ॥ 1 ॥ पीव मिलन को अहिनिशि जागी, अजहूँ मेरी पलक न लागी ॥ 2 ॥ जतन-जतन कर पंथ निहारूँ, पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥ 3 ॥ अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी, कहै दादू सुन विपति हमारी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 ४. विरह चिन्ता । गजताल सो दिन कबहूँ आवेगा, दादूड़ा पीव पावेगा ॥ टेक ॥ क्यूं ही अपने अंग लगावेगा, तब सब दुख मेरा जावेगा ॥ 1 ॥ पीव अपने बैन सुनावेगा, तब आनंद अंग न मावेगा ॥ 2 ॥ पीव मेरी प्यास मिटावेगा, तब आपहि प्रेम पिलावेगा ॥ 3 ॥ दे अपना दर्श दिखावेगा, तब दादू मंगल गावेगा ॥ 4 ॥ ९. विरह प्रीति । पंचम ताल तैं मन मोह्यो मोर रे, रह न सकूँ हौं राम जी ॥ टेक ॥ तोरे नांव चित लाइया रे, औरन भया उदास। साँईं ये समझाइया, हौं संग न छाडूं पास रे ॥ 1 ॥ जाणूं तिलहि न बिछुटूं रे, जनि पछतावा होइ। गुण तेरे रसना जपूं, सुणसी साँई सोइ रे ॥ 2 ॥ भोरे जन्म गँमाइया रे, चीन्हा नहीं सो सार। अजहूँ यह अचेत है, और नहीं आधार रे ॥ 3 ॥ पीव की प्रीत तो पाइये रे, जो सिर होवे भाग। यो तो अनत न जाइसी, रहसी चरणहुँ लाग रे ॥ 4 ॥ अनतैं मन निवारिया रे, मोहि एकै सेती काज। अनत गये दुख ऊपजै, मोहि एकै सेती राज रे ॥ 5 ॥ साँईं सौं सहजैं रमूँ रे, और नहीं आन देव। तहाँ मन विलंबिया, जहाँ अलख अभेव रे ॥ 6 ॥ चरण कमल चित लाइया रे, भोरैं ही ले भाव। दादू जन अचेत है, सहजैं ही तूँ आव रे ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
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विरह विलाप । पंचमताल विरहनी को श्रृंगार न भावे, है कोई ऐसा राम मिलावे ॥ टेक ॥ विसरे अंजन मंजन चीरा, विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥ 1 ॥ नव-सत थाके सकल श्रृंगारा, है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥ 2 ॥ देह गेह नहीं सुधि शरीरा, निशदिन चितवत चातक नीरा ॥ 3 ॥ दादू ताहि न भावे आन, राम बिना भई मृतक समान ॥ 4 ॥
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करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल अब तो मोहि लागी बाइ, उन निश्चल चित्त लियो चुराइ ॥ टेक ॥ आन न रुचै और नहीं भावै, अगम अगोचर तहँ मन जाइ। रूप न रेख वर्ण कहूँ कैसा, तिन चरणों चित्त रह्या समाइ ॥ 1 ॥ तिन चरणों चित्त सहज समाना, सो रस भीना तहँ मन धाइ। अब तो ऐसी बन आई, विष तजैं अरु अमृत खाइ ॥ 2 ॥ कहा करूँ, मेरा वश नांही, और न मेरे अंग सुहाइ। पल इक दादू देखन पावै, तो जन्म जन्म की तृषा बुझाइ ॥ 3 ॥
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करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल तूँ जनि छाड़ै केशवा, मेरे और निवाहनहार हो ॥ टेक ॥ अवगुण मेरे देखकर, तूँ ना करि मैला मन। दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवक जन हो ॥ 1 ॥ हम अपराधी जन्म के, नखशिख भरे विकार। मेट हमारे अवगुणा, तूँ गरवा सिरजनहार हो ॥ 2 ॥ मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुम ही लेहु सँवार । समर्थ मेरा सांइयाँ, तूँ आपै आप उधार हो ॥ 3 ॥ तूँ न विसारी केशवा, मैं जन भूला तोहि। दादू को और निवाह ले, अब जनि छाड़े मोहि हो ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 13. केवल विनती । गजताल राम सँभालिये रे, विषम दुहेली बार ॥ टेक ॥ मंझ समंदां नावरी रे, बूडे खेवट-बाज। काढनहारा को नहीं, एक राम बिन आज ॥ 1 ॥ पार न पहुँचै राम बिन, भेरा भवजल मांहि। तारणहारा एक तूँ, दूजा कोई नांहि ॥ 2 ॥ पार परोहन तो चले, तुम खेवहु सिरजनहार। भव सागर में डूब है, तुम्ह बिन प्राण अधार ॥ 3 ॥ औघट दरिया क्यों तिरे, बोहिथ बैसणहार। दादू खेवट राम बिन, कौण उतारे पार ॥ 4 ॥ 14. रंग ताल पार नहीं पाइये रे, राम बिना को निर्वाणहार ॥ टेक ॥ तुम बिन तारण को नहीं, दूभर यहु संसार। पैरत थाके केशवा, सूझै वार न पार ॥ 1 ॥ विषम भयानक भव-जला, तुम्ह बिन भारी होइ। तूँ हरि तारण केशवा, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥ तुम्ह बिन खेवट को नहीं, अतिर तिरा नहिं जाइ। औघट भेरा डूब है, नांही आन उपाइ ॥ 3 ॥ यहु घट औघट विषम है, डूबत मांहि शरीर । दादू कायर, राम बिन, मन नहिं बाँधै धीर ॥ 4 ॥ 15. रंग ताल क्यों हम जीवैं दास गुसाँई, जे तुम छाड़हु समर्थ साँई ॥ टेक ॥ जे तुम जन को मनहिं बिसारा, तो दूसर कौण संभालणहारा ॥ 1 ॥ जे तुम परिहर रहो नियारे, तो सेवक जाइ कवन के द्वारे ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 जे जन सेवक बहुत बिगारे, तो साहिब गरवा दोष निवारे ॥ ३ ॥ समर्थ साँई साहिब मेरा, दादू दास दीन है तेरा ॥ ४ ॥ 16. करुणा । वीर विक्रम ताल क्यों कर मिलै मोकौं राम गुसाँई, यहु बिषिया मेरे वश नांही ॥ टेक ॥ यहु मन मेरा दहदिशि धावै, नियरे राम न देखन पावे ॥ 1 ॥ जिह्वा स्वाद सबै रस लागे, इन्द्री भोग विषय को जागे ॥ 2 ॥ श्रवणहुँ साच कदे नहिं भावे, नैन रूप तहँ देख लुभावे ॥ 3 ॥ काम क्रोध कदे नहीं छीजे, लालच लाग विषय रस पीजे ॥ 4 ॥ दादू देख मिले क्यों साँई, विषय विकार बसे मन मांही ॥ 5 ॥ 17. परिचय विनती । वीर विक्रम ताल जो रे भाई ! राम दया नहीं करते । नवका नाम खेवट हरि आपै, यों बिन क्यों निस्तरते ॥ टेक ॥ करणी कठिन होत नहिं मोपै, क्यों कर ये दिन भरते । लालच लाग परत पावक में, आपहि आपै जरते ॥ 1 ॥ स्वाद हि संग विषय नहिं छूटै, मन निश्चल नहिं धरते । खाय हलाहल सुख के तांई, आपै ही पच मरते ॥ 2 ॥ मैं कामी कपटी क्रोध काया में, कूप परत नहिं डरते । करवत काम शीश धर अपने, आपहि आप विहरते ॥ 3 ॥ हरि अपना अंग आप नहिं छाड़ै, अपनी आप विचरते । पिता क्यों पूत को मारै, दादू यूं जन तिरते ॥ 4 ॥ 18. विरह विलाप विनती । द्वितीय ताल तो लग जनि मारे तूँ मोहि, जो लग मैं देखूं नहिं तोहि ॥ टेक ॥ अब के बिछुरे मिलन कैसे होइ, इहि विधि बहुरि न चिन्है कोइ ॥ 1 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 दीन दयाल दया कर जोइ, सब सुख आनंद तुम्ह तैं होइ ॥ 2 ॥ जन्म-जन्म के बन्धन खोइ, देखन दादू अहिनिशि रोइ ॥ 3 ॥ 19. स्पर्श विनती । द्वितीय ताल संग न छाडूं मेरा पावन पीव, मैं बलि तेरे जीवन जीव ॥ टेक ॥ संग तुम्हारे सब सुख होहि, चरण कमल मुख देखूं तोहि ॥ 1 ॥ अनेक जतन कर पाया सोइ, देखूं नैनहुँ तो सुख होइ ॥ 2 ॥ शरण तुम्हारी अंतर वास, चरण कमल तहँ देहु निवास ॥ 3 ॥ अब दादू मन अनत न जाइ, अंतर वेधि रह्यो ल्यौ लाइ ॥ 4 ॥ 20. परिचय विनती (गुजराती भाषा) । त्रिताल नहीं मेल्हूँ , राम ! नहीं मेल्हूँ , मैं शोधि लीधो नहीं मेल्हूँ, चित्त तुम्ह सूं बांधूं नहीं मेल्हूँ ॥ टेक ॥ हूँ तारे काजे तालाबेली, हवे केम मने जाशे मेल्ही ॥ 1 ॥ साहसि तूं ने मनसों गाढो, चरण समानों केवी पेरे काढो ॥ 2 ॥ राखिश हदे तूं मारो स्वामी, मैं दुहिले पाम्यों अंतरजामी ॥ 3 ॥ हवे न मेल्हूँ तूं स्वामी मारो, दादू सन्मुख सेवक तारो ॥ 4 ॥ 21. परिचय करुणा विनती । दादरा राम ! सुनहु न विपति हमारी हो, तेरी मूरति की बलिहारी हो ॥ टेक ॥ मैं जु चरण चित चाहना, तुम सेवक साधारना ॥ 1 ॥ तेरे दिन प्रति चरण दिखावना, कर दया अंतर आवना ॥ 2 ॥ जन दादू विपति सुनावना, तुम गोविन्द तपत बुझावना ॥ 3 ॥ 22. परिचय विनती-प्रश्न । द्रुताली कौण भांति भल मानैं गुसाँई, तुम्ह भावे सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
कै भल मानैं नाचें गायें, कै भल मानैं लोक रिझायें ॥ 1 ॥ कै भल मानैं तीरथ न्हायें, कै भल मानैं मूंड़ मुंडायें ॥ 2 ॥ कै भल मानैं सब घर त्यागी, कै भल मानैं भये वैरागी ॥ 3 ॥ कै भल मानैं जटा बधाये, कै भल मानैं भस्म लगाये ॥ 4 ॥ कै भल मानैं वन वन डोलें, कै भल मानैं मुखहि न बोलें ॥ 5 ॥ कै भल मानैं जप तप कीये, कै भल मानैं करवत लीये ॥ 6 ॥ कै भल मानैं ब्रह्म गियानी, कै भल मानैं अधिक धियानी ॥ 7 ॥ जे तुम्ह भावै सो तुम्ह पै आहि, दादू न जाणैं कहि समझाहि ॥ 8 ॥ साखी से उत्तर- दादू जे तूँ समझै तो कहूँ, साचा एक अलेख । डाल पान तज मूल गहि, क्या दिखलावै भेष ॥ 1 ॥ दादू सच बिन साँई ना मिलै, भावै भेष बनाइ । भावै करवत उरध मुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 2 ॥
२३. परिचय विनती अहो ! गुण तोर, अवगुण मोर, गुसाँई । तुम कृत कीन्हा, सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥ तुम उपकार किये हरि केते, सो हम बिसर गये । आप उपाइ अग्निमुख राखे, तहाँ प्रतिपाल भये, हो गुसाँई ॥ 1 ॥ नख-सिख साज किये हो संजीवन, उदर आधार दिये । अन्न-पान जहाँ जाइ भस्म हो, तहाँ तैं राखि लिये, हो गुसाँई ॥ 2 ॥ दिन दिन जान जतन कर पोषे, सदा समीप रहे । अगम अपार किये गुन केते, कबहुँ नांहि कहे, हो गुसाँई ॥ 3 ॥ कबहूँ नांहि न तुम तन चितवत, माया मोह परे । दादू तुम तज जाइ गुसाँई, विषया मांहि जरे, हो गुसाँई ॥ 4 ॥
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