सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
कै भल मानैं नाचें गायें, कै भल मानैं लोक रिझायें ॥ 1 ॥ कै भल मानैं तीरथ न्हायें, कै भल मानैं मूंड़ मुंडायें ॥ 2 ॥ कै भल मानैं सब घर त्यागी, कै भल मानैं भये वैरागी ॥ 3 ॥ कै भल मानैं जटा बधाये, कै भल मानैं भस्म लगाये ॥ 4 ॥ कै भल मानैं वन वन डोलें, कै भल मानैं मुखहि न बोलें ॥ 5 ॥ कै भल मानैं जप तप कीये, कै भल मानैं करवत लीये ॥ 6 ॥ कै भल मानैं ब्रह्म गियानी, कै भल मानैं अधिक धियानी ॥ 7 ॥ जे तुम्ह भावै सो तुम्ह पै आहि, दादू न जाणैं कहि समझाहि ॥ 8 ॥ साखी से उत्तर- दादू जे तूँ समझै तो कहूँ, साचा एक अलेख । डाल पान तज मूल गहि, क्या दिखलावै भेष ॥ 1 ॥ दादू सच बिन साँई ना मिलै, भावै भेष बनाइ । भावै करवत उरध मुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 2 ॥
२३. परिचय विनती अहो ! गुण तोर, अवगुण मोर, गुसाँई । तुम कृत कीन्हा, सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥ तुम उपकार किये हरि केते, सो हम बिसर गये । आप उपाइ अग्निमुख राखे, तहाँ प्रतिपाल भये, हो गुसाँई ॥ 1 ॥ नख-सिख साज किये हो संजीवन, उदर आधार दिये । अन्न-पान जहाँ जाइ भस्म हो, तहाँ तैं राखि लिये, हो गुसाँई ॥ 2 ॥ दिन दिन जान जतन कर पोषे, सदा समीप रहे । अगम अपार किये गुन केते, कबहुँ नांहि कहे, हो गुसाँई ॥ 3 ॥ कबहूँ नांहि न तुम तन चितवत, माया मोह परे । दादू तुम तज जाइ गुसाँई, विषया मांहि जरे, हो गुसाँई ॥ 4 ॥
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