भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 साथ सवारी ले न गयो रे, चालण लागो बोले । तब जाइ जियरा जाणैगो रे, बाँधे ही कोई खोले ॥ 1 ॥ तिल तिल मांहैं चेत चली रे, पंथ हमारा तोले । गहिला दादू कछू न जाणै, राख ले मेरे मोले ॥ 2 ॥ 27. अबल वैराग्य । त्रिताल ता सुख को कहो का कीजै, जातैं पल पल यहु तन छीजै ॥ टेक ॥ आसन कुंजर सिर छत्र धरीजै, ताथैं फिरि फिरि दुःख सहीजै ॥ 1 ॥ सेज सँवार, सुन्दरी संग रमीजै, खाइ हलाहल भरम मरीजै ॥ 2 ॥ बहु विधि भोजन मान रुचि लीजै, स्वाद संकट भ्रम पाश परीजै ॥ 3 ॥ ये तज दादू प्राण पतीजै, सब सुख रसना राम रमीजै ॥ 4 ॥ 28. उपदेश । एकेताल मन निर्मल तन निर्मल भाई, आन उपाइ विकार न जाई ॥ टेक ॥ जो मन कोयला तो तन कारा, कोटि करै नहिं जाइ विकारा ॥ 1 ॥ जो मन विषहर तो तन भुवंगा, करै उपाइ विषय पुनि संगा ॥ 2 ॥ मन मैला तन उज्जवल नांहीं, बहु पचहारे विकार न जांहीं ॥ 3 ॥ मन निर्मल तन निर्मल होई, दादू साच विचारै कोई ॥ 4 ॥ 29. उपदेश चेतावनी । त्रिताल मैं मैं करत सबै जग जावै, अजहूँ अंध न चेते रे । यह दुनिया सब देख दिवानी, भूल गये हैं केते रे ॥ टेक ॥ मैं मेरे में भूल रहे रे, साजन सोइ विसारा । आया हीरा हाथ अमोलक, जन्म जुवा ज्यों हारा ॥ 1 ॥ लालच लोभैं लाग रहे रे, जानत मेरी मेरा । आपहि आप विचारत नाहीं, तूँ का को को तेरा ॥ 2 ॥

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