भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1


आवत हैं सब जाता दीसैं, इनमें तेरा नाहीं । इन सौं लाग जन्म जनि खोवै, शोधि देख सचु मांहीं ॥ 3 ॥ निहचल सौं मन मानैं मेरा, साँई सौं बन आई । दादू एक तुम्हारा साजन, जिन यहु भुरकी लाई ॥ 4 ॥

३०. उपदेश चेतावनी । त्रिताल का जिवना का मरणा रे भाई, जो तैं राम न रमसि अघाई ॥ टेक ॥ का सुख संपत्ति छत्रपति राजा, वनखंड जाइ बसे किहिं काजा ॥ 1 ॥ का विद्या गुन पाठ पुराना, का मूरख जो तैं राम न जाना ॥ 2 ॥ का आसन कर अहर्निशि जागे, का फिर सोवत राम न लागे ॥ 3 ॥ का मुक्ता, का बंधे होई, दादू राम न जाना सोई ॥ 4 ॥

३१. मन प्रबोध । पंजाबी त्रिताल मन रे राम बिना तन छीजे । जब यहु जाइ मिलै माटी में, तब कहु कैसे कीजै ॥ टेक ॥ पारस परस कंचन कर लीजे, सहज सुरति सुखदाई । माया बेलि विषय फल लागे, ता पर भूल न भाई ॥ 1 ॥ जब लग प्राण पिंड है नीका, तब लग ताहि जनि भूलै । यहु संसार सेमल के सुख ज्यों, ता पर तूँ जनि फूलै ॥ 2 ॥ अवसर यह जान जगजीवन, समझ देख सचु पावै । अंग अनेक आन मत भूलै, दादू जनि डहकावै ॥ 3 ॥

३२. मृगोक्ति उपदेश। झपताल मोह्यो मृग देख वन अंधा, सूझत नहीं काल के फंधा ॥ टेक ॥ फूल्यो फिरत सकल वन मांही, सिर साधे शर सूझत नांही ॥ 1 ॥ उदमद मातो वन के ठाट, छाड़ चल्यो सब बारह बाट ॥ 2 ॥

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