सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश । सुर नर साधू संतजन, सो रस पीवै शेष ॥ 1 ॥ सिध साधक योगी जती, सती सबै शुकदेव । पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥ 2 ॥ इहि रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास । पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूँ प्रेम पियास ॥ 3 ॥ यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ । मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 4 ॥ 59. त्रिताल मन मतवाला मधु पीवै, पीवै बारम्बारो रे । हरि रस रातो राम के, सदा रहै इकतारो रे ॥ टेक ॥ भाव भक्ति भाठी भई, काया कसणी सारो रे । पोता मेरे प्रेम का, सदा अखंडित धारो रे ॥ 1 ॥ ब्रह्म अग्नि जौबन जरै, चेतन चितहि उजासो रे । सुमति कलाली सारवै, कोई पीवै विरला दासो रे ॥ 2 ॥ प्रीति पियाले पीवही, छिन-छिन बारंबारो रे । आपा धन सब सौंपिया, तब रस पाया सारो रे ॥ 3 ॥ आपा पर नहिं जाणिये, भूलो माया जालो रे । दादू हरि रस जे पिवै, ताको कदे न लागै कालो रे ॥ 4 ॥ 60. पंचम ताल रस के रसिया लीन भये, सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥ टेक ॥ राम रसायन अमृत माते, अविचल भये नरक नहीं जाते ॥ 1 ॥ राम रसायन भर भर पीवै, सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥ 2 ॥ राम रसायन त्रिभुवन सार, राम रसिक सब उतरे पार ॥ 3 ॥
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