भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 दादू अमली बहुरि न आये, सुख सागर ता मांहि समाये ॥ 4 ॥ 61. भेष । पंचम ताल भेष न रीझे मेरा निज भर्तार, तातें कीजै प्रीति विचार ॥ टेक ॥ दुराचारिणी रच भेष बनावै, शील साच नहिं पिव को भावै ॥ 1 ॥ कंत न भावै करै श्रृंगार, डिंभपणैं रीझै संसार ॥ 2 ॥ जो पै पतिव्रता ह्वै है नारी, सो धन भावै पियहिं पियारी ॥ 3 ॥ पीव पहचानें आन नहिं कोई, दादू सोई सुहागिनी होई ॥ 4 ॥ 62. विरह । घट ताल सब हम नारी एक भर्तार, सब कोई तन करैं श्रृंगार ॥ टेक ॥ घर घर अपने सेज सँवारैं, कंत पियारे पंथ निहारैं ॥ 1 ॥ आरत अपने पीव को धावैं, मिलै नाह कब अंग लगावैं ॥ 2 ॥ अति आतुर ये खोजत डोलैं, बान परी वियोगिनि बोलैं ॥ 3 ॥ सब हम नारी दादू दीन, दे सुहाग काहू संग लीन ॥ 4 ॥ 63. आत्मार्थी भेष । घट ताल सोई सुहागिनी साच श्रृंगार, तन मन लाइ भजै भर्तार ॥ टेक ॥ भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै, नारी सोई सार सुख पावै ॥ 1 ॥ सहज संतोंष शील सब आया, तब नारी नाह अमोलक पाया ॥ 2 ॥ तन मन जौबन सौंप सब दीन्हा, तब कंत रिझाइ आप वश कीन्हा ॥ 3 ॥ दादू बहुरि वियोग न होई, पीव सौं प्रीति सुहागिनी सोई ॥ 4 ॥ 64. समता । वर्ण भिन्न ताल तब हम एक भये रे भाई, मोहन मिलि सांची मति आई ॥ टेक ॥ पारस परस भये सुखदाई, तब दुतिया, दुर्मति दूर गँवाई ॥ 1 ॥ मलियागिरि मरम मिल पाया, तब वंश वरण कुल भ्रम गँवाया ॥ 2 ॥

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