भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 हरि जल नीर निकट जब आया, तब बूँद बूँद मिल सहज समाया ॥ 3 ॥ नाना भेद भ्रम सब भागा, तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥ 4 ॥ 65. वर्ण भिन्न ताल अलह राम छूटा भ्रम मोरा । हिंदू तुरक भेद कछु नांही, देखूं दर्शन तोरा ॥ टेक ॥ सोई प्राण पिंड पुनि सोई, सोई लोही मांसा । सोई नैन नासिका सोई, सहजैं कीन्ह तमासा ॥ 1 ॥ श्रवणों शब्द बाजता सुणिये, जिह्वा मीठा लागै । सोई भूख सबन को व्यापै, एक जुगति सोई जागै ॥ 2 ॥ सोई संधि बंध पुनि सोई, सोई सुख सोई पीरा । सोई हस्त पाँव पुनि सोई, सोई एक शरीरा ॥ 3 ॥ यहु सब खेल खालिक हरि तेरा, तैं ही एक कर लीना । दादू जुगति जान कर ऐसी, तब यहु प्राण पतीना ॥ 4 ॥ 66. नटताल भाई रे ऐसा पंथ हमारा, द्वै पख रहित पंथ गह पूरा,अवरण एक अधारा ॥ टेक ॥ वाद-विवाद काहू सौं नांहीं, माहीं जगत तैं न्यारा । सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आप ही आप विचारा ॥ 1 ॥ मैं तैं मेरी यहु मति नाहीं, निर्वैरी निरकारा । पूरण सबै देख आपा पर, निरालंब निरधारा ॥ 2 ॥ काहु के संग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा । मनही मन सौं समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥ 3 ॥ काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा । इहि पथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज संभारा ॥ 4 ॥

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