भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 70. पंजाबी त्रिताल ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी, इहि घर होइ सहज सुख जानी ॥ टेक ॥ गंग जमुन तहँ नीर नहाई, सुषमन नारी रंग लगाई ॥ 1 ॥ आप तेज तन रह्यो समाइ, मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥ 2 ॥ वास निरन्तर सो समझाइ, बिन नैनहुँ देखूँ तहाँ जाइ ॥ 3 ॥ दादू रे यहु अगम अपार, सो धन मेरे अधर अधार ॥ 4 ॥ 71. परिचय सत्संग । पंजाबी त्रिताल अब तो ऐसी बन आई, राम-चरण बिन रह्यो न जाई ॥ टेक ॥ साँई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई । चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥ 1 ॥ जे रस भीना छावर जावै, सुन्दरी सहजैं संग समाई । अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वाहीणैं कीरति गाई ॥ 2 ॥ कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई, अविगति अंतर ज्योति जगाई । दादू उनको मरम न जानै, आप सुरंगे बैन बजाई ॥ 3 ॥ 72. राज मृगांक ताल नीके राम कहत है बपुरा । घर मांही घर निर्मल राखै, पंचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥ सहज समर्पण सुमिरण सेवा, तिरवेणी तट संजम सपरा । सुन्दरी सन्मुख जागण लागी, तहँ मोहन मेरा मन पकरा ॥ 1 ॥ बिन रसना मोहन गुण गावै, नाना वाणी अनुभव अपरा । दादू अनहद ऐसे कहिये, भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥ 2 ॥ 73. मनसा गायत्री। राज मृगांक ताल अवधू ! कामधेनु गहि राखी, वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै, आगै चार न नाखी ॥ टेक ॥

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