सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 अपने जीव विचारत नांहीं, क्या ले गइला वंश तुम्हारा ॥ टेक ॥ तब मेरा कृत करता नांही, आवत है हंकारा। काल चक्र सौं खरी परी रे, विसर गया घरबारा ॥ 1 ॥ जाइ तहाँ का संजम कीजै, विकट पंथ गिरिधारा। दादू रे तन अपना नांहीं, तो कैसे भया संसारा ॥ 2 ॥ ४४. निसारुक ताल दादू दास पुकारे रे, सिर काल तुम्हारे रे, सर सांधे मारे रे ॥ टेक ॥ जम काल निवारी रे, मन मनसा मारी रे, यहु जन्म न हारी रे ॥ 1 ॥ सुख नींद न सोई रे, अपना दुख रोई रे, मन मूल न खोई रे ॥ 2 ॥ सिर भार न लीजी रे, जिसका तिसको दीजी रे, अब ढील न कीजी रे ॥ 3 ॥ यहु औसर तेरा रे, पंथी जाग सवेरा रे, सब बाट बसेरा रे ॥ 4 ॥ सब तरुवर छाया रे, धन जौबन माया रे, यहु काची काया रे ॥ 5 ॥ इस भ्रम न भूली रे, बाजी देख न फूली रे, सुख सागर झूली रे ॥ 6 ॥ रस अमृत पीजी रे, विष का नाम न लीजी रे, कह्या सो कीजी रे ॥ 7 ॥ सब आतम जाणी रे, अपणा पीव पिछाणी रे, यहु दादू वाणी रे ॥ 8 ॥ ४९. भक्ति उपदेश । त्रिताल पूजूं पहली गणपति राइ, पड़िहौं पावों चरणों धाइ। आगै ह्वै कर तीर लगावै, सहजैं अपने बैन सुनाइ ॥ टेक ॥ कहूँ कथा कुछ कही न जाई, इक तिल में ले सबै समाइ ॥ 1 ॥ गुण हु गहीर धीर तन देही, ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥ 2 ॥ जिस दिशि देखूं ओही है रे, आप रह्या गिरि तरुवर छाइ ॥ 3 ॥ दादू रे आगै क्या होवै, प्रीति पिया कर जोड़ लगाइ ॥ 4 ॥
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