सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4 सबै दोष दादू के दूर कर, तुम ही रहो हरी ॥ 3 ॥ 103. तर्क चेतावनी । राज विद्याधर ताल मन मतिहीण धरै, मूरख मन कछु समझत नाहीं, ऐसैं जाइ जरै ॥ टेक ॥ नाम बिसार अवर चित राखै, कूड़े काज करै । सेवा हरि की मनहुँ न आणै, मूरख बहुरि मरै ॥ 1 ॥ नाम संगम कर लीजे प्राणी, जम तैं कहा डरै । दादू रे जे राम संभारै, सागर तीर तिरै ॥ 2 ॥ 104. संत सहाय रक्षा । राज मृगांक ताल पीव तैं अपने काज सँवारे । कोई दुष्ट दीन कों मारन, सोई गहि तैं मारे ॥ टेक ॥ मेरु समान ताप तन व्यापै, सहजैं ही सो टारे । संतन को सुखदाई माधो, बिन पावक फँद जारे ॥ 1 ॥ तुम थैं होइ सबै विधि समर्थ, आगम सबै विचारे । संत उबार दुष्ट दुख दीन्हा, अंध कूप में डारे ॥ 2 ॥ ऐसा है सिर खसम हमारे, तुम जीते खल हारे । दादू सौं ऐसे निर्बहिये, प्रेम प्रीति पिव प्यारे ॥ 3 ॥ 105. माया । मल्लिका मोद ताल काहू तेरा मर्म न जाना रे, सब भये दीवाना रे ॥ टेक ॥ माया के रस राते माते, जगत भुलाना रे । को काहू का कह्या न मानै, भये अयाना रे ॥ 1 ॥ माया मोहे मुदित मगन, खानखाना रे । विषिया रस अरस परस, साच ठाना रे ॥ 2 ॥ आदि अंत जीव जन्त, किया पयाना रे । दादू सब भ्रम भूले, देखि दाना रे ॥ 3 ॥
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