सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4 106. अनन्य शरण। मल्लिका मोद ताल तूँ ही तूँ गुरुदेव हमारा, सब कुछ मेरे नाम तुम्हारा ॥ टेक॥ तुम हीं पूजा, तुम हीं सेवा, तुम हीं पाती, तुम हीं देवा ॥ 1 ॥ योग यज्ञ तूँ साधन जाप, तुम हीं मेरे आपै आपं ॥ 2 ॥ तप तीरथ तूँ व्रत स्नाना, तुम हीं ज्ञाना तुम हीं ध्याना ॥ 3 ॥ वेद भेद तूँ पाठ पुराणा, दादू के तुम पिंड पराणा ॥ 4 ॥ 107. गजताल तूँ ही तूँ आधार हमारे, सेवक सुत हम राम तुम्हारे ॥ टेक॥ माई बाप तूँ साहिब मेरा, भक्ति-हीण मैं सेवक तेरा ॥ 1 ॥ मात पिता तूँ बान्धव भाई, तुम ही मेरे सजन सहाई ॥ 2 ॥ तुम हीं तातं तुम ही मातं, तुम ही जातं, तुम्ह ही न्यातं ॥ 3 ॥ कुल कुटुम्ब तूँ सब परिवारा, दादू का तूँ तारणहारा ॥ 4 ॥ 108. परिचय विनती । भंग ताल नूर नैन भरि देखन दीजे, अमी महारस भर भर पीजे ॥ टेक॥ अमृत धारा, वार न पारा, निर्मल सारा तेज तुम्हारा ॥ 1 ॥ अजर जरंता, अमी झरंता, तार अनंता बहु गुणवंता ॥ 2 ॥ झिलमिल सांई, ज्योति गुसांई, दादू मांही नूर रहांई ॥ 3 ॥ 109. परिचय । भंगताल ऐन एक सो मीठा लागै, ज्योति स्वरूपी ठाढ़ा आगे ॥ टेक॥ झिलमिल करणां, अजरा जरणां, नीझर झरणां, तहँ मन धरणां ॥ 1 ॥ निज निरधारं, निर्मल सारं, तेज अपारं, प्राण अधारं ॥ 2 ॥ अगहा गहणां, अकहा कहणां, अलहा लहणां, तहँ मिल रहणां ॥ 3 ॥ निरसंध नूरं, सब भरपूरं, सदा हजूरं, दादू सूरं ॥ 4 ॥
- 347 -