भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 122. विनती । मल्लिका मोद ताल पीवजी सेती नेह नवेला, अति मीठा मोहि भावे रे । निशदिन देखौं बाट तुम्हारी, कब मेरे घर आवे रे ॥ टेक ॥ आइ बनी है साहिब सेती, तिस बिन तिल क्यों जावे रे । दासी कों दर्शन हरि दीजे, अब क्यों आप छिपावे रे ॥ 1 ॥ तिल तिल देखूं साहिब मेरा, त्यों त्यों आनन्द अंग न मावे रे । दादू ऊपर दया मया करि, कब नैनहुँ नैन मिलावे रे ॥ 2 ॥ 123. (गुजराती भाषा) । राज मृगांक ताल पीव घर आवे रे, वेदन मारी जाणी रे । विरह संताप कौण पर कीजे, कहूँ छूं दुख नी कहाणी रे ॥ टेक ॥ अंतरजामी नाथ मारा, तुज बिण हूँ सीदाणी रे । मंदिर मारे केम न आवे, रजनी जाइ बिहाणी रे ॥ 1 ॥ तारी बाट हूँ जोइ थाकी, नैण निखूट्या पाणी रे । दादू तुज बिण दीन दुखी रे, तूं साथी रह्यो छे ताणी रे ॥ 2 ॥ 124. (गुजराती) विरह विनती । राज मृगांक ताल कब मिलसी पीव गृह छाती, हौं औराँ संग मिलाती ॥ टेक ॥ तिसज लागी तिसही केरी, जन्म जन्म नो साथी । मीत हमारा आव पियारा, ताहरा रंग नी राती ॥ 1 ॥ पीव बिना मने नींद न आवे, गुण ताहरा ले गाती । दादू ऊपर दया मया करि, ताहरे वारणे जाती ॥ 2 ॥ 125. विरह (गुजराती) । राज विद्याधर ताल म्हारा रे वाहला ने काजे, हृदये जोवा ने हौं ध्यान धरूं। आकुल थाये प्राण मारा, कोने कही पर करूं ॥ टेक ॥ संभार्यो आवे रे वाहला, वेहला एहों जोई ठरूं।

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