भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 देह गृह हूँ तेने आपूं, जे कोई गोविन्द आणे रे ॥ 2 ॥ जगपति ने जोवा ने काजे, आतुर थई रही रे । दादू ने देखाड़ो स्वामी, व्याकुल होई गई रे ॥ 3 ॥ 147. विरह विलाप । पंजाबी त्रिताल कबहुँ ऐसा विरह उपावै रे, पीव बिन देखे जीव जावै रे ॥ टेक ॥ विपति हमारी सुनहु सहेली, पीव बिन चैन न आवै रे । ज्यौं जल भिन्न मीन तन तलफै, पीव बिन वज्र बिहावै रे ॥ 1 ॥ ऐसी प्रीति प्रेम की लागै, ज्यौं पंखी पीव सुनावै रे । त्यूं मन मेरा रहै निसवासर, कोइ पीव कूं आण मिलावै रे ॥ 2 ॥ तो मन मेरा धीरजधरही, कोइ आगम आण जनावे रे । तो सुख जीव दादू का पावै, पल पिवजी आप दिखावे रे ॥ 3 ॥ 148. (गुजराती भाषा) पंजाबी त्रिताल अमे विरहणिया राम तुम्हारड़िया । तुम बिन नाथ अनाथ, कांइ बिसारड़िया ॥ टेक ॥ अपने अंग अनल परजाले, नाथ निकट नहिं आवे रे । दर्शन कारण विरहनि व्याकुल, और न कोई भावे रे ॥ 1 ॥ आप अपरछन अमने देखे, आपणपो न दिखाड़े रे । प्राणी पिंजर लेइ रह्यो रे, आड़ा अन्तर पाड़े रे ॥ 2 ॥ देव देव कर दरशन माँगे, अन्तरजामी आपे रे । दादू विरहणी वन वन ढूँढ़े, ये दुख कांइ न कापे रे ॥ 3 ॥ 149. विरह प्रश्न । राज विद्याधर ताल पंथीड़ा बूझै विरहणी, कहिनैं पीव की बात, कब घरआवै कब मिलूँ, जोऊँ दिन अरु रात, पंथीड़ा ॥ टेक ॥

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