सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग मारू 7 कहाँ मेरा प्रीतम कहाँ बसै, कहाँ रहै कर वास? कहँ ढूँढूँ कहँ पाइये, कहाँ रहे किस पास, पंथीड़ा ॥ 1 ॥ कवन देश कहँ जाइये, कीजे कौन उपाय ? कौन अंग कैसे रहे, कहा करै, समझाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥ परम सनेही प्राण का, सो कत देहु दिखाइ । जीवनि मेरे जीव की, सो मुझ आनि मिलाइ, पंथीड़ा ॥ 3 ॥ नैन न आवै नींदड़ी, निशदिन तलफत जाइ । दादू आतुर विरहणी, क्यूं करि रैन विहाइ, पंथीड़ा ॥ 4 ॥ 150. समुच्चय उत्तर । राज विद्याधर ताल पंथीड़ा पंथ पिछाणी रे पीव का, गहि विरहै की बाट । जीवत मृतकह्वै चले, लंघे औघट घाट, पंथीड़ा ॥ टेक ॥ सतगुरु सिर पर राखिये, निर्मल ज्ञान विचार । प्रेम भक्ति कर प्रीत सौं, सन्मुख सिरजनहार, पंथीड़ा ॥ 1 ॥ पर आतम सौं आत्मा, ज्यों जल जलहि समाइ । मन हीं सौं मन लाइये, लै के मारग जाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥ तालाबेली ऊपजै, आतुर पीड़ पुकार । सुमिर सनेही आपणा, निशदिन बारम्बार, पंथीड़ा ॥ 3 ॥ देखि देखि पग राखिये, मारग खांडे धार । मनसा वाचा कर्मणा, दादू लंघे पार, पंथीड़ा ॥ 4 ॥ 151. अनुक्रम से उत्तर । राज मृगांक ताल साध कहैं उपदेश विरहणी ! तन भूले तब पाइये, निकट भया परदेश, विरहणी ॥ टेक ॥ तुम ही माहैं ते बसैं, तहाँ रहे कर वास । तहँ ढूँढ़े पीव पाइये, जीवन जीव के पास, विरहणी ॥ 1 ॥
- 365 -