सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग मारू 7 परम देश तहँ जाइये, आतम लीन उपाइ। एक अंग ऐसे रहै, ज्यों जल जलहि समाइ, विरहणी ॥ 2 ॥ सदा संगाती आपणा, कबहूँ दूर न जाइ। प्राण सनेही पाइये, तन मन लेहु लगाइ, विरहणी ॥ 3 ॥ जागै जगपति देखिये, प्रकट मिल है आइ। दादू सन्मुख ह्वै रहै, आनन्द अंग न माइ, विरहणी ॥ 4 ॥ 152. विरह विनती । गुजराती मकरन्द ताल गोविन्दा ! गाइबा दे रे, आडड़ी आन निवार, गोविन्दा गाइबा दे रे। अनुदिन अंतर आनन्द कीजे, भक्ति प्रेम रस सार रे ॥ टेक ॥ अनभै आत्म अभै एक रस, निर्भय कांइ न कीजै रे। अमी महारस अमृत आपै, अम्हे रसिक रस पीजे रे ॥ 1 ॥ अविचल अमर अखै अविनाशी, ते रस कांइ न दीजे रे। आतम राम अधार अम्हारो, जन्म सुफल कर लीजे रे ॥ 2 ॥ देव दयाल कृपाल दमोदर, प्रेम बिना क्यों रहिये रे। दादू रंग भर राम रमाड़ो, भक्त-बछल तूँ कहिये रे ॥ 3 ॥ 153. (गुजराती भाषा) । मकरन्द ताल गोविन्दा जोइबा देरे, जे बरजे ते वारी रे । गोविन्दा जोइबा दे रे। आदि पुरुष तूँ अच्छय अम्हारो, कंत तुम्हारी नारी रे ॥ टेक ॥ अंगै संगै रंगै रमिये, देवा दूर न कीजे रे। रस मांही रस इम थई रहिये, ये सुख अमने दीजे रे ॥ 1 ॥ सेजड़िये सुख रंग भर रमिये, प्रेम भक्ति रस लीजे रे। एकमेक रस केलि करतां, अम्हे अबला इम जीजे रे ॥ 2 ॥ समर्थ स्वामी अन्तरजामी, बार बार कांइ बाहे रे।
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