सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
DevanagariHindipublished504 पृष्ठ
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
- चौताल आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई। जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥ जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई। काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥ आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई। लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥ कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई। काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥ काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई। काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
- हित उपदेश । त्रिताल तो को केता कह्या मन मेरे । क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥ आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे। काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥ ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे। रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥
- (गुजराती) । त्रिताल मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥ बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल। करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥ अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल। दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
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