भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 काम दलन करुणामयी, तूँ देव मुरारी ॥ 2 ॥ सब कंपैं करतार तैं, भव-बंधन पाशा। अरि रिपु भंजन भय गता, सब विघ्न विनाशा ॥ 3 ॥ सिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम माहीं। दादू सेवक राम का निर्भय, न डराहीं ॥ 4 ॥ 182. हितोपदेश । त्रिताल हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥ जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै। तब त्रिविध ताप तन नाशौ, तब सुख की राशि विलासै ॥ 1 ॥ जब चरण क मल चित लागै, तब माथै मीच न जागै। तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ 2 ॥ जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै। तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ 3 ॥ जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी। तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ 4 ॥ 183. संत उपदेश । राज मृगांक ताल संतों ! और कहो क्या कहिये । हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये ॥ टेक ॥ हम तुम मांहि बसै सो स्वामी, सांचे सौं सचु लहिये। दर्शन परसन जुग जुग कीजे, काहे को दुख सहिये ॥ 1 ॥ हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये। चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥ 2 ॥ हम तुम तारन तेज घन सुन्दर, नीके सौं निरबहिये। दादू देख और दुख सब ही, तामें तन क्यों दहिये ॥ 3 ॥

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