सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली 8 गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे। दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥ 4 ॥ 194. उपदेश । प्रतिताल हरि राम बिना सब भर्मि गये, कोई जन तेरा साच गहै ॥ टेक ॥ पीवै नीर तृषा तन भाजै, ज्ञान गुरु बिन कोइ न लहै। प्रकट पूरा समझ न आवै, तातैं सो जन दूर रहै ॥ 1 ॥ हर्ष शोक दोउ सम कर राखै, एक एक के संग न बहै। अनतहि जाइ तहाँदुख पावै, आपहि आपा आप दहै ॥ 2 ॥ आपा पर भरम सब छाड़ै, तोनि लोक पर ताहि धरै। सो जन सही साच कौं परसे, अमर मिले नहिं कबहूँ मरै ॥ 3 ॥ पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर, राम रसायन भर पीवै। सदा आनन्द सुखी साचे सौं, कहै दादू सो जन जीवै ॥ 4 ॥ 195. भ्रम विध्वंसण । प्रतिताल जग अंधा नैन न सूझै, जिन सिरजे, ताहि न बूझै ॥ टेक ॥ पाहण की पूजा करै, करै आतम घाता। निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥ 1 ॥ पूजै देव दिहाड़ियां, महा-माई मानैं। प्रकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ 2 ॥ भैरुं भूत सब भ्रम के, पशु प्राणी ध्यावैं। सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥ 3 ॥ आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही । दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥ 4 ॥ 196. अन्य उपासक विस्मयवादी भ्रम । रंग ताल
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