सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली 8 सो शर लागि प्रेम प्रकाशा, प्रकटी प्रीतम वाणी। दादू दीन दयाल ही जानै, सुख में सुरति समानी ॥ 4 ॥ 204. निज स्थान निर्णय । झपताल मध्य नैन निरखूं सदा, सो सहज स्वरूप । देखत ही मन मोहिया, है तो तत्त्व अनूप ॥ टेक॥ त्रिवेणी तट पाइया, मूरति अविनाशी। जुग जुग मेरा भावता, सोई सुख राशी ॥ 1 ॥ तारुणी तट देखि हूँ, तहाँ सुस्थाना। सेवक स्वामी संग रहें, बैठे भगवाना ॥ 2 ॥ निर्भय थान सुहात सो, तहँ सेवक स्वामी। अनेक जतन कर पाइया, मैं अन्तरजामी ॥ 3 ॥ तेज तार परिमित नहीं, ऐसा उजियारा। दादू पार न पाइये, सो स्वरूप संभारा ॥ 4 ॥ 205. झपताल निकट निरंजन देखि हौं, छिन दूर न जाई । बाहर भीतर एक सा, सहजैं रह्या समाई ॥ टेक॥ सतगुरु भेद लखाइया, तब पूरा पाया। नैनन ही निरखूं सदा, घर सहजैं आया ॥ 1 ॥ पूरे सौं परचा भया, पूरी मति जागी। जीव जान जीवन मिल्या, ऐसे बड़ भागी ॥ 2 ॥ रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा। जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥ 3 ॥ सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी। दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥ 4 ॥
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