भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग रामकली ४ २०६. परिचय उपदेश । त्रिताल सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि । रूप अरूप निर्गुण आगुण में, त्रिभुवन देव मुरारि ॥ टेक ॥ बारम्बार निरख जग जीवन, इहि घर हरि अविनाशी । सुन्दरी जाइ सेज सुख विलसे, पूरण परम निवासी ॥ 1 ॥ सहजैं संग परस जगजीवन, आसण अमर अकेला । सुन्दरी जाइ सेज सुख सोवै, जीव ब्रह्म का मेला ॥ 2 ॥ मिलि आनन्द प्रीति करि पावन, अगम निगम जहाँ राजा । जाइ तहाँ परस पावन को, सुन्दरी सारे काजा ॥ 3 ॥ मंगलाचार चहुँ दिशि रोपै, जब सुन्दरी पिव पावै । परम ज्योति पूरे सौं मिल कर, दादू रंग लगावै ॥ 4 ॥ २०७. वस्तु निर्देश । त्रिताल तहँ आपै आप निरंजना, तहँ निसवासर नहि संजमा ॥ टेक ॥ तहँ धरती अम्बर नाहीं, तहँ धूप न दीसै छांहीं । तहँ पवन न चालै पानी, तहँ आपै एक बिनानी ॥ 1 ॥ तहँ चंद न ऊगै सूरा, मुख काल न बाजै तूरा । तहँ सुख दुख का गम नाहीं, ओ तो अगम अगोचर माहीं ॥ 2 ॥ तहँ काल काया नहिं लागै, तहँ को सोवै को जागै । तहँ पाप पुण्य नहिं कोई, तहँ अलख निरंजन सोई ॥ 3 ॥ तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी । सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥ 4 ॥ २०८. त्रिताल अवधू ! बोल निरंजन बाणी, तहँ एकै अनहद जाणी ॥ टेक ॥ तहँ वसुधा का बल नाहीं, तहँ गगन घाम नहिं छाहीं ।

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