सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखालिक खेलै खेल कर, बूझै विरला कोइ। (21-37) लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 2 ॥ 235. समर्थाई । झपताल हरे ! हरे !! सकल भुवन भरे, जुग जुग सब करे। जुग जुग सब धरे, अकल सकल जरे, हरे हरे ॥टेक॥ सकल भुवन छाजै, सकल भुवन राजै, सकल कहै। धरती अम्बर गहै, चंद सूर सुधि लहै, पवन प्रकट बहै ॥ 1 ॥ घट घट आप देवै, घट घट आप लेवै, मंडित माया। जहाँ तहाँ आप राया, जहाँ तहाँ आप छाया, अगम निगम पाया ॥ 2 ॥ रस मांही रस राता, रस मांहीं रस माता, अमृत पीया। नूर मांही नूर लीया, तेज मांही तेज कीया, दादू दर्श दीया ॥ 3 ॥ 236. परिचय उपदेश । चौताल पीव पीव, आदि अंत पीव । परसि परसि अंग संग, पीव तहाँ जीव ॥टेक॥ मन पवन भवन गवन, प्राण कँवल मांहि। निधि निवास विधि विलास, रात दिवस नांहि ॥ 1 ॥ सास वास आस पास, आत्म अंग लगाइ। ऐन बैन निरख नैन, गाइ गाइ रिझाइ ॥ 2 ॥ आदि तेज अंत तेज, सहजैं सहज आइ। आदि नूर अंत नूर, दादू बलि बलि जाइ ॥ 3 ॥ 237. (फारसी) चौताल नूर नूर अव्वल आखिर नूर । दायम कायम कायम दायम, हाजिर है भरपूर ॥टेक॥