सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 247. झपताल सुख सागर में झूलबो, कश्मल झड़ै हो अपार । निर्मल प्राणी होइबो, मिलिबो सिरजनहार ॥ टेक ॥ तिहिं संजम पावन सदा, पंक न लागै प्राण । कँवल बिगासे तिहि तणौं, उपजे ब्रह्म गियान ॥ 1 ॥ आगम निगम तहँ गम करै, तत्त्वैं तत्त्व मिलान । आसन गुरु के आइबो, मुक्तैं महल समान ॥ 2 ॥ प्राणी परि पूजा करै, पूरै प्रेम विलास । सहजैं सुन्दर सेविये, लागी लै कविलास ॥ 3 ॥ रैण दिवस दीसै नहीं, सहजैं पुंज प्रकास । दादू दर्शन देखिये, इहि रस रातो हो दास ॥ 4 ॥ 248. शूल ताल अविनाशी संग आत्मा, रमे हो रैण दिन राम । एक निरंतर ते भजे, हरि हरि प्राणी नाम ॥ टेक ॥ सदा अखंडित उर बसै, सो मन जाणी ले । सकल निरंतर पूरि सब, आतम रातो ते ॥ 1 ॥ निराधार निज बैसणों, जिहिं तत आसन पूर । गुरु सिख आनन्द ऊपजै, सन्मुख सदा हजूर ॥ 2 ॥ निश्चल ते चालै नहीं, प्राणी ते परिमाण । साथी साथैं ते रहें, जाणैं जाण सुजाण ॥ 3 ॥ ते निर्गुण आगुण धरी, मांहैं कौतुकहार । देह अछत अलगो रहै, दादू सेव अपार ॥ 4 ॥ 249. शूल ताल पारब्रह्म भज प्राणिया, अविगत एक अपार ।
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