सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥ टेक ॥ ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहंत । आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनंत ॥ 1 ॥ अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान। निरालम्ब भजि तेहनों, आनंद आत्मराम ॥ 2 ॥ निर्गुण निश्चल थिर रहै, निराकार निज सोइ। ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥ 3 ॥ अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार । गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥ 4 ॥ 250. शूरतान झपताल क्यूं भाजै सेवक तेरा, ऐसा सिर साहिब मेरा ॥ टेक ॥ जाके धरती गगन आकाशा, जाके चंद सूर कविलाशा। जाके तेज पवन जल साजा, जाके पंच तत्त्व के बाजा ॥ 1 ॥ जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीनदयाला। जाके सायर अनन्त तरंगा, जाके चौरासी लख संगा ॥ 2 ॥ जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भंता। जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखै कौतुकहारा ॥ 3 ॥ जाके काल मीच डर नांहीं, सो बरत रह्या सब मांहीं। मन भावै खेलै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥ 4 ॥ जाके ब्रह्मा ईश्वर बंदा, सब मुनिजन लागे अंगा। जाके साध सिद्ध सब मांहीं, परिपूरण परिमित नांहीं ॥ 5 ॥ सोई भानै घड़ै संवारै, जुग केते कबहुँ न हारै। ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवनि आतम मूरा ॥ 6 ॥ सो सबहिन की सुधि जानै, जो जैसा तैसी बानै। सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥ 7 ॥
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