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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥ टेक ॥ ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहंत । आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनंत ॥ 1 ॥ अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान। निरालम्ब भजि तेहनों, आनंद आत्मराम ॥ 2 ॥ निर्गुण निश्चल थिर रहै, निराकार निज सोइ। ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥ 3 ॥ अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार । गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥ 4 ॥ 250. शूरतान झपताल क्यूं भाजै सेवक तेरा, ऐसा सिर साहिब मेरा ॥ टेक ॥ जाके धरती गगन आकाशा, जाके चंद सूर कविलाशा। जाके तेज पवन जल साजा, जाके पंच तत्त्व के बाजा ॥ 1 ॥ जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीनदयाला। जाके सायर अनन्त तरंगा, जाके चौरासी लख संगा ॥ 2 ॥ जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भंता। जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखै कौतुकहारा ॥ 3 ॥ जाके काल मीच डर नांहीं, सो बरत रह्या सब मांहीं। मन भावै खेलै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥ 4 ॥ जाके ब्रह्मा ईश्वर बंदा, सब मुनिजन लागे अंगा। जाके साध सिद्ध सब मांहीं, परिपूरण परिमित नांहीं ॥ 5 ॥ सोई भानै घड़ै संवारै, जुग केते कबहुँ न हारै। ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवनि आतम मूरा ॥ 6 ॥ सो सबहिन की सुधि जानै, जो जैसा तैसी बानै। सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥ 7 ॥

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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 जे हरि जन सेवक भाजै, तो ऐसा साहिब लाजै । अब मरण माँड हरि आगे, तो दादू बाण न लागे ॥ 8 ॥ 251. झपताल हरि भजतां किमि भाजिये, भाजे भल नांहीं । भाजे भल क्यूं पाइये, पछतावै मांहीं ॥ टेक ॥ सूरा सो सहजैं भिड़ै, सार उर झेलै । रण रोकै भाजै नहीं, ते बाण न मेलै ॥ 1 ॥ सती सत साचा गहै, मरणे न डराई । प्राण तजै जग देखतां, पियड़ो उर लाई ॥ 2 ॥ प्राण पतंगा यों तजै, वो अंग न मोड़ै । जौवन जारै ज्योति सूं, नैना भल जोड़ै ॥ 3 ॥ सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तजि आसा । दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥ 4 ॥ 252. चेतावनी । रुद्र ताल सुन तूँ मना रे, मूरख मूढ़ विचार, आवै लहरि बिहावणी, दमै देह अपार ॥ टेक ॥ करिबो है तिमि कीजिये रे, सुमिर सो आधार ॥ 1 ॥ चरण बिहूणो चालबो रे, संभारी ले सार ॥ 2 ॥ दादू तेहज लीजिये रे, सांचो सिरजनहार ॥ 3 ॥ 253. (गुजराती) रुद्र । ताल रे मन साथी माहरा, तूनें समझायो कै बारो रे । रातो रंग कसुंभ के, तैं बिसार्यो आधारो रे ॥ टेक ॥ स्वप्ना सुख के कारणे, फिर पीछे दुख होई रे ।

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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 दीपक दृष्टि पतंग ज्यों, यों भ्रमि जले जनि कोई रे ॥ 1 ॥ जिह्वा स्वारथ आपने, ज्यूं मीन मरे तज नीरो रे। मांहैं जाल न जाणियो, तातैं उपनों दुःख शरीरो रे ॥ 2 ॥ स्वादैं ही संकट पर्यो देखत ही नर अंधो रे। मूरख मूठी छाड़ि दे, होइ रह्यो निर्बंधो रे ॥ 3 ॥ मान सिखावणि माहरी, तू हरि भज मूल न हारी रे। सुख सागर सोई सेविये, जन दादू राम सँभारी रे ॥ 4 ॥ इति राग सिन्दूरा सम्पूर्ण ॥ 10 ॥ पद 8 ॥

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अथ राग देवगांधार ११ (गायन समय प्रातः 6 से 9) 254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल शरण तुम्हारी आइ परे । जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥ कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे । कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥ कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े । कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥ अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे । हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11 255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल बौरी ! तूँ बार बार बौरानी। सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥ चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो । सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥ तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी। इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥ प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी। निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥ पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै। दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥ 256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो, सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥ जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो। कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥ कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो। दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥ इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥

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अथ राग (कल्हेरौ) कालिंगड़ा 12 (गायन समय प्रभात 3 से 6) 257. (गुजराती) विनती। रंग ताल वाल्हा, हूँ ताहरी, तूँ माहरो नाथ । तुम सौं पहली प्रीतड़ी, पूरबलो साथ ॥ टेक ॥ वाल्हा मैं तूँ म्हारो ओलखियो रे, राखिस तूँनें हृदा मंझारि । हूँ पामूं पीव आपणों रे, त्रिभुवन दाता देव मुरारि ॥ 1 ॥ वाल्हा मन माहरो मन मांही राखिस, आत्म एक निरंजन देव । चित मांहैं चित सदा निरंतर, येणी पेरे तुम्हारी सेव ॥ 2 ॥ वाल्हा भाव भक्ति हरि भजन तुम्हारो, प्रेमें पूरि कँवल विगास। अभि-अंतर आनन्द अविनाशी, दादू नी एह्रैं पूरवी आस ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कलिंगड़ा 12 258. (गुजराती) उपदेश चेतावनी। वर्ण भिन्नताल वारीवार कहूँ रे गहिला, राम राम कांइ विसाऱ्यो रे । जनम अमोलक पामियो, एह्वो रतन कांई हाऱ्यो रे ॥ टेक ॥ विषया बाह्यो नें तहँ धायो, कीधो नहिं मारो वाऱ्यो रे । माया धन जोई नें भूल्यो, सर्वस येणें हाऱ्यो रे ॥ 1 ॥ गर्भवास देह दमतो प्राणी, आश्रम तेह संभाऱ्यो रे । दादू रे जन राम भणीजे, नहिं तो जथा विधि हाऱ्यो रे ॥ 2 ॥ इति राग कालिंगडा सम्पूर्णः ॥ 12 ॥ 2 पद ॥

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राग परजिया www.dadooram.org अथ राग परजिया (परज) 13 (गायन समय रात्रि 3 से 6) 259. परिचय । खेमटा ताल नूर रह्या भरपूर, अमी रस पीजिये, रस मांही रस होइ, लाहा लीजिये ॥ टेक ॥ प्रकट तेज अनन्त, पार नहिं पाइये । झिलमिल झिलमिल होइ, तहाँ मन लाइये ॥ 1 ॥ सहजैं सदा प्रकाश, ज्योति जल पूरिया । तहाँ रहें निज दास, सेवक सूरिया ॥ 2 ॥ सुख सागर वार न पार, हमारा वास है । हंस रहें ता मांहिं, दादू दास है ॥ 3 ॥ इति राग परजिया सम्पूर्णः ॥ 13 ॥ पद 1 ॥

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राग भवानी www.dadooram.org अथ राग भांणमली (भवानी) 14 (गायन समय मध्यरात्रि, राग मंजरी मतानुसार) 260. (गुजराती) विनती । कौव्वाली ताल मारा वाल्हा रे ! तारे शरणि रहेश । बीनतड़ी वाल्हा नें कहतां, अनंत सुख लहेश ॥ टेक ॥ स्वामी तणों हूँ संग न मेलूं, बिनतड़ी कहेश । हूँ अबला तूँ बलवंत राजा, तारा बना वहेश ॥ 1 ॥ संग रहूँ तां सब सुख पामूं, अंतर थैं दहेश । दादू ऊपर दया करीनें, आवो एणढ़ वेश ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भवानी 14

२६१. (गुजराती) जलद त्रिताल चरण देखाड़ तो प्रमाण । स्वामी माहरे नैणें निरखूं, मांगू येज मान ॥ टेक ॥ जोवूं तुझनें आशा मुझनें, लागूं येज ध्यान । वाहलो मारो मलो रे सहिये, आवे केवल ज्ञान ॥ 1 ॥ जेणी पेरें हूँ देखूं तुझने, मुझनें आलो जाण । पीव तणी हूँ पर नहिं जाणूं, दादू रे अजाण ॥ 2 ॥ २६२. (गुजराती) जलद त्रिताल ते हरि मलू मारो नाथ ! जोवा ने मारो तन तपे, केवी पेरें पामूं साथ ॥ टेक ॥ ते कारण हूँ आकुल व्याकुल, ऊभी करूं विलाप । स्वामी मारो नैणें निरखूं, ते तणों मनें ताप ॥ 1 ॥ एक वार घर आवे वाहला, नव मेलूं कर हाथ। ये वीनती सांभल स्वामी, दादू तारो दास ॥ 2 ॥ २६३. रंगताल ते केम पामिये रे, दुर्लभ जे आधार। ते बिना तारण को नहीं, केम उतरिये पार ॥ टेक ॥ केवी पेरें कीजे आपणो रे, तत्व ते छे सार । मन मनोरथ पूरे मारा, तन नो ताप निवार ॥ 1 ॥ संभान्यो आवे रे वाहला, वेला ये अवार। विरहणी विलाप करे, तेम दादू मन विचार ॥ 2 ॥ इति राग भांणमली सम्पूर्णः ॥ 14 ॥ पद 4 ॥

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राग सारंग अथ राग सारंग 15 (गायन समय मध्य दिन) 264. गुरु ज्ञान सूर । फख्ता ताल हो ऐसा ज्ञान ध्यान, गुरु बिना क्यों पावै । वार पार, पार वार, दुस्तर तिर आवै हो ।। टेक ।। भवन गवन, गवन भवन, मन ही मन लावै । रवन छवन, छवन रवन, सतगुरु समझावै हो ।। 1 ।। क्षीर नीर, नीर क्षीर, प्रेम भक्ति भावै । प्राण कँवल विकस विकस, गोविन्द गुण गावै हो ।। 2 ।। ज्योति जुगति बाट घाट, लै समाधि ध्यावै । परम नूर परम तेज, दादू दिखलावै हो ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15 265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥ जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥ हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥ हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥ तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥ 266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल माया संसार की सब झूठी । मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥ जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी । हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥ ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती । दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥ 267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥ संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही । राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥ तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई । आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥ सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा। जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥ भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै । जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15 २6४. परिचय उपदेश । त्रिताल चल-चल रे मन तहाँ जाइये । चरण बिन चालिबो, श्रवण बिन सुनिबो, बिन कर बैन बजाइये ॥ टेक ॥ तन नाहीं जहाँ, मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये । शब्द नहीं जहाँ, जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥ 1 ॥ पवन पावक नहीं, धरणी अंबर नहीं, उभय नहीं तहँ लाइये । चन्द नहीं जहाँ, सूर नहीं तहँ, परम ज्योति सुख पाइये ॥ 2 ॥ तेज पुंज सो सुख का सागर, झिलमिल नूर नहाइये । तहँ चल दादू अगम अगोचर, तामैं सहज समाइये ॥ 3 ॥ इति राग सारंग सम्पूर्णः ॥ 15 ॥ पद 5 ॥

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अथ राग टोडी (तोडी) 16 (गायन समय दिन 6 से 12) 269. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल सो तत सहजैं सुषमन कहणा, साँच पकड़ मन जुग जुग रहणा ।। टेक ।। प्रेम प्रीति कर नीका राखै, बारम्बार सहज नर भाषै ।। 1 ।। मुख हिरदै सो सहज संभारै, तिहि तत रहणा कदे न विसारै ।। 2 ।। अन्तर सोई नीका जाणै, निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ।। 3 ।। सोई सुजाण सुधा रस पीवै, दादू देखि जुग जुग जीवै ।। 4 ।। 270. नाम महिमा । राज मृंगाक ताल नाँव रे नाँव रे, नाँव रे नाँव रे,

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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 सकल शिरोमणि नाँव रे, मै बलिहारी जाँव रे ॥ टेक ॥ दुस्तर तारै, पार उतारै, नरक निवारै नाँव रे ॥ 1 ॥ तारणहारा, भवजल पारा, निरमल सारा नाँव रे ॥ 2 ॥ नूर दिखावै, तेज मिलावै, ज्योति जगावै नाँव रे ॥ 3 ॥ सब कुछ दाता, अमृत राता, दादू माता नाँव रे ॥ 4 ॥ 271. केवल विनती । राज विद्याधर ताल राइ रे राइ रे, सकल भुवनपति राइ रे, अमृत देहु अघाइ रे राइ ॥ टेक ॥ प्रगट राता, प्रगट माता, प्रगट नूर दिखाइ रेराइ ॥ 1 ॥ सुस्थिर ज्ञाना, सुस्थिर ध्याना, सुस्थिर तेज मिलाइ रेराइ ॥ 2 ॥ अविचल मेला, अविचल खेला, अविचल ज्योति समाइ रे राइ ॥ 3 ॥ निहचल बैना, निहचल नैना, दादू बलि बलि जाइ रे राइ ॥ 4 ॥ 272. रसिक अवस्था । सवारी ताल हरि रस माते मगन भये । सुमिर सुमिर भये मतवाले, जामण मरण सब भूल गये ॥ टेक ॥ निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं, आन न दूजा भाव धरैं । सहजैं सदा राम रंग राते, मुक्ति वैकुंठैं कहा करैं ॥ 1 ॥ गाइ गाइ रस लीन भये हैं, कछू न मांगैं संत जना । और अनेक देहु दत्त आगै, आन न भावै राम बिना ॥ 2 ॥ इक टग ध्यान रहैं ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैं । दादू मगन रहैं रस माते, ऐसे हरि के जन जीवैं ॥ 3 ॥ 273. (गुजराती) केवल विनती । सवारी ताल ते मैं कीधेला राम ! जे तैं वाज्या ते ।

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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 मारग मेल्हि, अमारग अणसरि, अकरम, करम हरे ।। टेक ।। साधू को संग छाड़ी नें, असंगति अणसरियो। सुकृत मूकी, अविद्या साधी, बिषिया विस्तारियो ।। 1 ।। आन कह्युं आन सांभल्युं, नैणैं आन दीठो। अमृत कड़वो, विष अमी लागो, खातां अति मीठो ।। 2 ।। राम हृदाथी विसारी नें, माया मन दीधो। पाँचे प्राण गुरुमुख वरज्या, ते दादू कीधो ।। 3 ।। 274. विरह विनती । त्रिताल कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ? दे चरण-कँवल आधार हो। डूबत है भव-सागरा, कारी करो करतार हो ।। टेक ।। मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन यह विचार हो। जल बिन कैसे जीवहीं, इब तो किती इक बार हो ।। 1 ।। ज्यों परै पतंगा जोति में, देख देख निज सार हो। प्यासा बूँद न पावई, तब वन-वन करै पुकार हो ।। 2 ।। निसदिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो। दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो ।। 3 ।। 275. केवल विनती । त्रिताल तूँ साचा साहिब मेरा । कर्म करीम कृपालु निहारो, मैं जन बंदा तेरा ।। टेक ।। तुम्ह दीवान सबहिन की जानो, दीनानाथ दयाला। दिखाइ दीदार मौज बंदे को, कायम करो निहाला ।। 1 ।। मालिक सबै मुलिक के सांई, समर्थ सिरजनहारा। खैर खुदाइ खलक में खेलत, दे दीदार तुम्हारा ।। 2 ।। मैं शिकस्तः दरगह तेरी, हरि हजूर तूँ कहिये।

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दादू द्वारे दीन पुकारे, काहे न दर्शन लहिये ॥ 3 ॥ 276. उपदेश चेतावनी । मकरंद ताल कुछ चेति रे कहि क्या आया । इन में बैठा फूल कर, तैं देखी माया ॥ टेक ॥ तूँ जनि जानैं तन धन मेरा, मूरख देख भुलाया । आज काल चल जावै देही, ऐसी सुन्दर काया ॥ 1 ॥ राम नाम निज लीजिये, मैं कहि समझाया । दादू हरि की सेवा कीजे, सुन्दर साज मिलाया ॥ 2 ॥ 277. मकरंद ताल नेटि रे माटी में मिलना, मोड़ मोड़ देह काहे को चलना ॥ टेक ॥ काहे को अपना मन डुलावै, यहु तन अपना नीका धरना । कोटि वर्ष तूँ काहे न जीवै, विचार देख आगै है मरना ॥ 1 ॥ काहे न अपनी बाट सँवारै, संजम रहना, सुमिरण करणा । गहिला ! दादू गर्व न कीजे, यहु संसार पँच दिन भरणा ॥ 2 ॥ 278. ब्रह्मयोग ताल जाइ रे तन जाइ रे । जन्म सुफल कर लेहु राम रमि, सुमिर सुमिर गुण गाइ रे ॥ टेक ॥ नर नारायण सकल शिरोमणि, जनम अमोलक आइ रे । सो तन जाइ जगत नहिं जानै, सकै तो ठाहर लाइ रे ॥ 1 ॥ जरा काल दिन जाइ गरासै, तासौं कुछ न बसाइ रे । छिन छिन छीजत जाइ मुग्ध नर, अंत काल दिन आइ रे ॥ 2 ॥ प्रेम भगति, साधु की संगति, नाम निरंतर गाइ रे । जे सिर भाग तो सौंज सुफल कर, दादू विलम्ब न लाइ रे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 279. त्रिताल काहे रे बक मूल गँवावै, राम के नाम भलें सचु पावै ॥ टेक ॥ वाद विवाद न कीजे लोई, वाद विवाद न हरि रस होई । मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं, मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥ 1 ॥ हार जीत सौं हरि रस जाई, समझि देख मेरे मन भाई! मूल न छाड़ी दादू बौरै, जनि भूलै तूँ बकबे औरै ॥ 2 ॥ २४०. (फारसी) त्रिताल हुशियार हाकिम न्याव है, सांई के दीवान। कुल का हिसाब होगा, समझ मुसलमान ॥ टेक ॥ नीयत नेकी सालिकां, रास्ता ईमान। इखलास अंदर आपणे, रखणां सुबहान ॥ 1 ॥ हुक्म हाजिर होइ बाबा, मुसल्लम महरबान। अक्ल सेती आपमां, शोध लेहु सुजान ॥ 2 ॥ हक सौं हजूरी हूँणां, देखणां कर ज्ञान। दोस्त दाना दीन का, मनणां फरमान ॥ 3 ॥ गुस्सा हैवानी दूर कर, छाड़ दे अभिमान। दुई दरोगां नांहिं खुशियाँ, दादू लेहु पिछान ॥ 4 ॥ २४1. साधु प्रति उपदेश (गुजराती) । ललित ताल निर्पख रहणा, राम राम कहणा, काम क्रोध में देह न दहणा ॥ टेक ॥ जेणें मारग संसार जाइला, तेणें प्राणी आप बहाइला ॥ 1 ॥ जे जे करणी जगत करीला, सो करणी संत दूर धरीला ॥ 2 ॥ जेणें पंथैं लोक राता, तेणें पंथैं साधु न जाता ॥ 3 ॥ राम नाम दादू ऐसें कहिये, राम रमत रामहि मिल रहिये ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 282. भेष बिडंबन । ललित ताल हम पाया, हम पाया रे भाई । भेष बनाय ऐसी मन आई ॥ टेक ॥ भीतर का यहु भेद न जानै, कहै सुहागिनी क्यों मन मानै ॥ 1 ॥ अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं, भई सुहागिनी लोगन मांहीं ॥ 2 ॥ सांई स्वप्नै कबहुँ न आवै, कहबा ऐसे महल बुलावै ॥ 3 ॥ इन बातन मोहि अचरज आवै, पटम किये कैसे पीव पावै ॥ 4 ॥ दादू सुहागिनी ऐसे कोई, आपा मेट राम रत होई ॥ 5 ॥ 283. आत्म समता । उत्सव ताल ऐसे बाबा राम रमीजे, आतम सौं अंतर नहीं कीजे ॥ टेक ॥ जैसे आतम आपा लेखै, जीव जंतु ऐसे कर पेखै ॥ 1 ॥ एक राम ऐसे कर जानै, आपा पर अंतर नहिं आनै ॥ 2 ॥ सब घट आतम एक विचारे, राम सनेही प्राण हमारे ॥ 3 ॥ दादू साची राम सगाई, ऐसा भाव हमारे भाई ॥ 4 ॥ 284. नाम समता । उत्सव ताल माधइयो-माधइयो मीठो री माइ, माहवो-माहवो भेटियो आइ ॥ टेक ॥ कान्हइयो-कान्हइयो करता जाइ, केशवो केशवो केशवो धाइ ॥ 1 ॥ भूधरो भूधरो भूधरो भाइ, रमैयो रमैयो रह्यो समाइ ॥ 2 ॥ नरहरि नरहरि नरहरि राइ, गोविन्दो गोविन्दो दादू गाइ ॥ 3 ॥ 285. समता । बसंत ताल एकही एकै भया आनंद, एकही एकै भागे द्वन्द ॥ टेक ॥ एकही एकै एक समान, एकही एकै पद निर्वान ॥ 1 ॥ एकही एकै त्रिभुवन सार, एकही एकै अगम अपार ॥ 2 ॥ एकही एकै निर्भय होइ, एकही एकै काल न कोइ ॥ 3 ॥ एकही एकै घट प्रकास, एकही एकै निरंजन वास ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 एकही एकै आपहि आप, एकही एकै माइ न बाप ॥ 5 ॥ एकही एकै सहज स्वरूप, एकही एकै भये अनूप ॥ 6 ॥ एकही एकै अनत न जाइ, एकही एकै रह्या समाइ ॥ 7 ॥ एकही एकै भये लै लीन, एकही एकै दादू दीन ॥ 8 ॥ 286. विनती । वसंत ताल आदि है आदि अनादि मेरा, संसार सागर भक्ति भेरा । आदि है अंत है, अंत है आदि है, बिड़द तेरा ॥ टेक ॥ काल है झाल है, झाल है काल है, राखिले राखिले प्राण घेरा । जीव का जन्म का, जन्म का जीव का, आपही आपले भांन झेरा ॥ 1 ॥ मर्म का कर्म का, कर्म का मर्म का, आइबा जाइबा मेट फेरा । तार ले पार ले, पार ले तार ले, जीव सौं शिव है निकट नेरा ॥ 2 ॥ आत्मा राम है, राम है आत्मा, ज्योति है युक्ति सौं करो मेला । तेज है सेज है, सेज है तेज है, एक रस दादू खेल खेला ॥ 3 ॥ 287. परिचय । कोकिल ताल सुन्दर राम राया । परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया ॥ टेक ॥ अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया । निराकार निराधार, वार पार न पाया ॥ 1 ॥ गंभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा । अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा ॥ 2 ॥ परम नूर परम तेज, परम ज्योति प्रकाशा । परम पुंज परापरं, दादू निज दासा ॥ 3 ॥

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