सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 मारग मेल्हि, अमारग अणसरि, अकरम, करम हरे ।। टेक ।। साधू को संग छाड़ी नें, असंगति अणसरियो। सुकृत मूकी, अविद्या साधी, बिषिया विस्तारियो ।। 1 ।। आन कह्युं आन सांभल्युं, नैणैं आन दीठो। अमृत कड़वो, विष अमी लागो, खातां अति मीठो ।। 2 ।। राम हृदाथी विसारी नें, माया मन दीधो। पाँचे प्राण गुरुमुख वरज्या, ते दादू कीधो ।। 3 ।। 274. विरह विनती । त्रिताल कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ? दे चरण-कँवल आधार हो। डूबत है भव-सागरा, कारी करो करतार हो ।। टेक ।। मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन यह विचार हो। जल बिन कैसे जीवहीं, इब तो किती इक बार हो ।। 1 ।। ज्यों परै पतंगा जोति में, देख देख निज सार हो। प्यासा बूँद न पावई, तब वन-वन करै पुकार हो ।। 2 ।। निसदिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो। दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो ।। 3 ।। 275. केवल विनती । त्रिताल तूँ साचा साहिब मेरा । कर्म करीम कृपालु निहारो, मैं जन बंदा तेरा ।। टेक ।। तुम्ह दीवान सबहिन की जानो, दीनानाथ दयाला। दिखाइ दीदार मौज बंदे को, कायम करो निहाला ।। 1 ।। मालिक सबै मुलिक के सांई, समर्थ सिरजनहारा। खैर खुदाइ खलक में खेलत, दे दीदार तुम्हारा ।। 2 ।। मैं शिकस्तः दरगह तेरी, हरि हजूर तूँ कहिये।
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