सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11 255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल बौरी ! तूँ बार बार बौरानी। सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥ चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो । सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥ तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी। इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥ प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी। निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥ पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै। दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥ 256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो, सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥ जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो। कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥ कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो। दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥ इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥
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