सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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अथ राग देवगांधार ११ (गायन समय प्रातः 6 से 9) 254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल शरण तुम्हारी आइ परे । जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥ कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे । कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥ कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े । कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥ अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे । हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥
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