भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

अथ राग देवगांधार ११ (गायन समय प्रातः 6 से 9) 254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल शरण तुम्हारी आइ परे । जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥ कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे । कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥ कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े । कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥ अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे । हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥

  • 408 -