भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15 265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥ जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥ हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥ हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥ तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥ 266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल माया संसार की सब झूठी । मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥ जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी । हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥ ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती । दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥ 267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥ संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही । राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥ तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई । आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥ सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा। जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥ भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै । जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥

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