सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग बसंत 24 मनसा वाचा शरण तोर, दादू को राखो गोविन्द मोर ॥ ३ ॥ ३६८. उपदेश । एक ताल बहुरि न कीजे कपट कांम, हिरदै जपिये राम नांम ॥ टेक॥ हरि पाखैं नहिं कहूँ ठांम, पीव बिन खड़भड़ गांम गांम । तुम राखो जियरा अपनी मांम, अनत जनि जाय रहो विश्रांम ॥ १ ॥ कपट कांम नहीं कीजे हाँम, रघु चरण कमल कहु राम नांम । जब अंतरयामी रहै जांम, तब अक्षय पद जन दादू प्रांम ॥ २ ॥ ३६९. परिचय प्राप्ति । कड्डुक ताल तहँ खेलूं पीव सूं नित ही फाग, देख सखी री मेरे भाग ॥ टेक ॥ तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ, प्रेम पिलावै आप सोइ । संगियन सेती रमूं रास, तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥ १ ॥ तहँ वचन अमोलक सब ही सार, तहँ बरतै लीला अति अपार । उमंग देइ तब मेरे भाग, तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥ २ ॥ अलख देव कोइ जाणैं भेव, तहँ अलख देव की कीजै सेव । दादू बलि बलि बारंबार, तहँ आप निरंजन निराधार ॥ ३ ॥ ३७०. परिचय सुख वर्णन । षड़ताल मोहन माली सहज समाना, कोई जाणैं साध सुजाना ॥ टेक ॥ काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया । सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥ बाहर भीतर सर्व निरंतर, सब में रह्या समाई । परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥ २ ॥ ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै । अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥ ३ ॥
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