भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 371. परिचय । षड़ताल मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥ तहँ पायो देव निरंजना, परगट भयो हरि यह तना । नैनन ही देखूं अघाइ, प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ 1 ॥ मोहि कर नैनन की सैन देइ, प्राण मूंखि हरि मोर लेइ । तब उपजै मोकौं इहै बानि, निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ 2 ॥ अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, बैन बाण तातें लागे मोहि । शरणै दादू रह्यो जाइ, हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ 3 ॥ 372. थकित निश्चल । मदन ताल मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥ टेक ॥ हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन । उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥ 1 ॥ सहज समाधि तज विकार, अविनाशी रस पीवहिं सार । थकित भये मिल महल मांहिं, मनसा वाचा आन नांहिं ॥ 2 ॥ मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग । सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥ 3 ॥ इति राग बसंत सम्पूर्णः ॥ 24 ॥ पद 9 ॥

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