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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 371. परिचय । षड़ताल मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥ तहँ पायो देव निरंजना, परगट भयो हरि यह तना । नैनन ही देखूं अघाइ, प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ 1 ॥ मोहि कर नैनन की सैन देइ, प्राण मूंखि हरि मोर लेइ । तब उपजै मोकौं इहै बानि, निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ 2 ॥ अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, बैन बाण तातें लागे मोहि । शरणै दादू रह्यो जाइ, हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ 3 ॥ 372. थकित निश्चल । मदन ताल मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥ टेक ॥ हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन । उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥ 1 ॥ सहज समाधि तज विकार, अविनाशी रस पीवहिं सार । थकित भये मिल महल मांहिं, मनसा वाचा आन नांहिं ॥ 2 ॥ मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग । सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥ 3 ॥ इति राग बसंत सम्पूर्णः ॥ 24 ॥ पद 9 ॥

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राग भैरूं www.dadooram.org अथ राग भैरूं 25 (गायन समय प्रातः काल) 373. सतगुरु तथा नाम महिमा । त्रिताल सतगुरु चरणां मस्तक धरणां, राम नाम कहि दुस्तर तिरणां ॥ टेक ॥ अठ सिधि नव निधि सहजैं पावै, अमर अभै पद सुख में आवै ॥ 1 ॥ भक्ति मुक्ति बैकुंठा जाइ, अमर लोक फल लेवै आइ ॥ 2 ॥ परम पदारथ मंगल चार, साहिब के सब भरे भंडार ॥ 3 ॥ नूर तेज है ज्योति अपार, दादू राता सिरजनहार ॥ 4 ॥ 374. उत्तम ज्ञान स्मरण । चौताल तन ही राम मन ही राम, राम हृदय रमि राखि ले । मनसा राम सकल परिपूरण, सहज सदा रस चाखि ले ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25

नैनां राम बैनां राम, रसनां राम सँभारि ले । श्रवणां राम सन्मुख राम, रमता राम विचारि ले ॥ 1 ॥ श्वासैं राम सुरतैं राम, शब्दैं राम समाइ ले । अंतर राम निरंतर राम, आत्मराम ध्याइ ले ॥ 2 ॥ सर्वैं राम संगैं राम, राम नाम ल्यौ लाइ ले । बाहर राम भीतर राम, दादू गोविन्द गाइ ले ॥ 3 ॥

  1. उत्तम स्मरण। मदन ताल ऐसी सुरति राम ल्यौ लाइ, हरि हृदय जनि बिसरि जाइ ॥ टेक ॥ छिन छिन मात संभारै पूत, बिंद राखै जोगी अवधूत । त्रिया कुरूप रूप कों रटै, नटणी निरख बांस बरत चढ़ै ॥ 1 ॥ कच्छप दृष्टि धरै धियांन, चातक नीर प्रेम की बान । कुंजी कुरलि संभालै सोइ, भृंगी ध्यान कीट को होइ ॥ 2 ॥ श्रवणों शब्द ज्यूं सुनै कुरंग, ज्योति पतंग न मोड़ै अंग । जल बिन मीन तलफि ज्यों मरै, दादू सेवक ऐसै करै ॥ 3 ॥

  2. स्मरण फल। एक ताल निर्गुण राम रहै ल्यौ लाइ, सहजैं सहज मिलै हरि जाइ ॥ टेक ॥ भौजल व्याधि लिपै नही कबहूँ, करम न कोई लागै आइ । तीनों ताप जरै नहिं जियरा, सो पद परसै सहज सुभाइ ॥ 1 ॥ जन्म जरा जोनी नहिं आवै, माया मोह न लागै ताहि । पाँचों पीड़ प्राण नहीं व्यापै, सकल सोधि सब इहै उपाइ ॥ 2 ॥ संकट संशय नरक न नैनहूँ, ताको कबहूँ काल न खाइ । कंप न काई भय भ्रम भागै, सब विधि ऐसी एक लगाइ ॥ 3 ॥ सहज समाधि गहो जे दिढ़ करि, जासौँ लागै सोइ आइ । भृंगी होइ कीट की न्यांई, हरि जन दादू एक दिखाइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 377. आशीर्वाद । पड़ताल धन्य धन्य तूँ धन्य धणी, तुम्ह सौं मेरी आइ बणी ॥ टेक ॥ धन्य धन्य तूँ तारे जगदीश, सुर नर मुनिजन सेवैं ईश। धन्य धन्य तूँ केवल राम, शेष सहस्र मुख ले हरि नाम ॥ 1 ॥ धन्य धन्य तूँ सिरजनहार, तेरा कोई न पावै पार। धन्य धन्य तूँ निरंजन देव, दादू तेरा लखै न भेव ॥ 2 ॥ 378. भयभीत भयानक । दादरा का जानों मोहि का ले करसी ? तनहिं ताप मोहि छिन न विसरसी ॥ टेक ॥ आगम मोपै जान्यूं न जाहि, इहै विमासण जियरे मांहि ॥ 1 ॥ मैं नहिं जानों क्या सिर होइ, तातैं जियरा डरपै रोइ ॥ 2 ॥ काहू तैं ले कछू करै, तातैं मइया जीव डरै ॥ 3 ॥ दादू न जानें कैसे कहै, तुम शरणागति आइ रहै ॥ 4 ॥ 379. क्रीड़ा तालश्वण्डनि का जानों राम ! को गति मेरी ? मैं विषयी मनसा नहीं फेरी ॥ टेक ॥ जे मन मांगै सोई दीन्हा, जाता देख फेरि नहिं लीन्हा ॥ 1 ॥ देवा द्वन्द्वर अधिक पसारे, पाँचों पकर पटक नहिं मारे ॥ 2 ॥ इन बातन घट भरे विकारा, तृष्णा तेज मोह नहिं हारा ॥ 3 ॥ इनहिं लाग मैं सेव न जानी, कहै दादू सुन कर्म कहानी ॥ 4 ॥ 380. क्रीड़ा तालश्वण्डनि डरिये रे डरिये, तातैं राम नाम चित धरिये ॥ टेक ॥ जिन ये पँच पसारे रे, मारे रे ते मारे रे ॥ 1 ॥ जिन ये पँच समेटे रे, भेटे रे ते भेटे रे ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 कच्छप ज्यों कर लीये रे, जीये रे ते जीये रे ॥ ३ ॥ भृंगी कीट समाना रे, ध्याना रे यहु ध्याना रे ॥ 4 ॥ अजा सिंह ज्यों रहिये रे, दादू दर्शन लहिये रे ॥ 5 ॥ ३४1. हरि प्राप्ति दुर्लभ । त्रिताल तहँ मुझ कमीन की कौन चलावै, जाको अजहुँ मुनिजन महल न पावै ॥ टेक ॥ शिव विरंचि नारद यश गावैं, कौन भांति कर निकट बुलावैं ॥ 1 ॥ देवा सकल तेतीसौँ क्रोरि, रहे दरबार ठाड़े कर जोरि ॥ 2 ॥ सिध साधक रहे लयौ लाइ, अजहूँ मोटे महल न पाइ ॥ 3 ॥ सब तैं नीच मैं नाम न जाना, कहै दादू क्यों मिलै सयाना ॥ 4 ॥ ३४२. करूणा विनती । त्रिताल तुम बिन कहु क्यों जीवन मेरा, अजहूँ न देख्या दर्शन तेरा ॥ टेक ॥ होहु दयाल दीन के दाता, तुम पति पूरण सब विधि साचा ॥ 1 ॥ जो तुम करो सोई तुम छाजे, अपने जन को काहे न निवाजे ॥ 2 ॥ अकरन करन ऐसैं अब कीजे, अपनो जान कर दर्शन दीजे ॥ 3 ॥ दादू कहै सुनहु हरि सांई, दर्शन दीजे मिलो गुसांई ॥ 4 ॥ ३४३. उपदेश चेतावनी । पंजाबी त्रिताल कागा रे करंक पर बोलै, खाइ माँस अरु लग ही डोलै ॥ टेक ॥ जा तन को रचि अधिक सँवारा, तो तन ले माटी में डारा ॥ 1 ॥ जा तन देख अधिक नर फूले, सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥ 2 ॥ जा तन देख मन में गर्वाना, मिल गया माटी तज अभिमाना ॥ 3 ॥ दादू तन की कहा बड़ाई, निमष माँहि माटी मिल जाई ॥ 4 ॥

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५. आरती, नामावली एवं परिशिष्ट

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ३८४. उपदेश । त्रिताल जप गोविन्द, विसर जनि जाइ, जनम सुफल करिये लै लाइ ॥ टेक ॥ हरि सुमिरण सौं हेत लगाइ, भजन प्रेम यश गोविन्द गाइ । मानुष देह मुक्ति का द्वारा, राम सुमिर जग सिरजनहारा ॥ 1 ॥ जब लग विषम व्याधि नहिं आई, जब लग काल काया नहिं खाई । जब लग शब्द पलट नहीं जाई, तब लग सेवा कर राम राई ॥ 2 ॥ अवसर राम कहसि नहीं लोई, जनम गया तब कहै न कोई । जब लग जीवै तब लग सोई, पीछे फिर पछतावा होई ॥ 3 ॥ सांई सेवा सेवक लागे, सोई पावे जे कोइ जागे । गुरुमुख भरम तिमर सब भागे, बहुरि न उलटे मारग लागे ॥ 4 ॥ ऐसा अवसर बहुरि न तेरा, देख विचार समझ जिय मेरा । दादू हार जीत जग आया, बहुत भांति कह-कह समझाया ॥ 5 ॥ ३८५. प्रतिताल राम नाम तत काहे न बोलै, रे मन मूढ़ अनत जनि डोलै ॥ टेक ॥ भूला भरमत जन्म गमावै, यहु रस रसना काहै न गावै ॥ 1 ॥ क्या झक औरै परत जंजाले, वाणी विमल हरि काहे न सँभालै ॥ 2 ॥ राम विसार जन्म जनि खोवै, जपले जीवन साफल होवै ॥ 3 ॥ सार सुधा सदा रस पीजे, दादू तन धर लाहा लीजे ॥ 4 ॥ ३८६. तत्व उपदेश । प्रतिताल आप आपण में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥ ज्यों मही बिलोये माखण आवै, त्यों मन मथियां तैं तत पावै ॥ 1 ॥ काष्ठ हुताशन रह्या समाई, त्यूं मन माँही निरंजन राई ॥ 2 ॥ ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माँही साच सयाना ॥ 3 ॥ ज्यों दर्पण के नहिं लागै काई, त्यों मूरति माँही निरख लखाई ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25

सहजैं मन मथिया तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥ 5 ॥ 387. उपदेश । धीमा ताल मन मैला मन ही सौं धोइ, उनमनि लागै निर्मल होइ ॥ टेक ॥ मन ही उपजै विषय विकार, मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥ 1 ॥ मन ही दुविधा नाना भेद, मन ही समझै द्वै पख छेद ॥ 2 ॥ मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥ 3 ॥ मन ही उपजै अग्नि शरीर, मन ही शीतल निर्मल नीर ॥ 4 ॥ मन उपदेश मनही समझाइ, दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥ 5 ॥ 388. मन प्रति शूरातन । धीमा ताल रहु रे रहु मन मारूंगा, रती रती कर डारूंगा ॥ टेक ॥ खंड खंड कर नाखूंगा, जहाँ राम तहाँ राखूंगा ॥ 1 ॥ कह्या न मानै मेरा, सिर भानूंगा तेरा ॥ 2 ॥ घर में कदे न आवै, बाहर को उठि धावै ॥ 3 ॥ आतम राम न जानै, मेरा कह्या न मानै ॥ 4 ॥ दादू गुरुमुखि पूरा, मन सौं जूझै शूरा ॥ 5 ॥ 389. नाम शूरातन । मकरन्द ताल निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥ टेक ॥ सेवक शूर शंक नही मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥ 1 ॥ नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥ 2 ॥ सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥ 3 ॥ हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥ 4 ॥ 390. समर्थाई । प्रतिपाल

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ऐसो अलख अनंत अपारा, तीन लोक जाको विस्तारा ॥ टेक ॥ निर्मल सदा सहज घर रहै, ताको पार न कोई लहै। निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ, निश्चल सदा न आवै जाइ ॥ 1 ॥ अविनाशी है अपरंपार, आदि अनंत रहै निरधार। पावन सदा निरंतर आप, कला अतीत लिप्त नहिं पाप ॥ 2 ॥ समर्थ सोई सकल भरपूर, बाहर भीतर नेडा न दूर। अकल आप कलै नहीं कोई, सब घट रह्यो निरंजन होई ॥ 3 ॥ अवरण आपै अजर अलेख, अगम अगाध रूप नहिं रेख। अविगत की गति लखी न जाइ, दादू दीन ताहि चित्त लाइ ॥ 4 ॥ 391. समर्थ लीला । तिलवाड़ा ऐसो राजा सेऊँ ताहि, और अनेक सब लागे जाहि ॥ टेक ॥ तीन लोक ग्रह धरे रचाइ, चंद सूर दोऊ दीपक लाइ। पवन बुहारे गृह आँगणां, छपन कोटि जल जाके घरां ॥ 1 ॥ राते सेवा शंकर देव, ब्रह्म कुलाल न जानै भेव। कीरति करणा चारों वेद, नेति नेति न विजाणै भेद ॥ 2 ॥ सकल देवपति सेवा करैं, मुनि अनेक एक चित्त धरैं। चित्र विचित्र लिखैं दरबार, धर्मराइ ठाढ़े गुण सार ॥ 3 ॥ रिधि सिधि दासी आगे रहैं, चार पदारथ जी जी कहैं। सकल सिद्ध रहैं ल्यौ लाइ, सब परिपूरण ऐसो राइ ॥ 4 ॥ खलक खजीना भरे भंडार, ता घर बरतै सब संसार। पूरि दीवान सहज सब दे, सदा निरंजन ऐसो है ॥ 5 ॥ नारद गावैं गुण गोविन्द, करैं शारदा सब ही छंद। नटवर नाचै कला अनेक, आपन देखै चरित अलेख ॥ 6 ॥ सकल साध बाजैं नीशान, जै जैकार न मेटै आन। मालिनी पुहुप अठारह भार, आपण दाता सिरजनहार ॥ 7 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि । दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥ 8 ॥ ३9२. जीवित मृतक । एकताल जब यहु मैं मैं मेरी जाइ, तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥ टेक ॥ मैं मैं मेरी तब लग दूर, मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥ 1 ॥ मैं मैं मेरी तब लग नांहि, मैं मैं मेटि मिलै मन माँहि ॥ 2 ॥ मैं मैं मेरी न पावै कोइ, मैं मैं मेटि मिलै जन सोइ ॥ 3 ॥ दादू मैं मैं मेरी मेटि, तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥ 4 ॥ ३9३. ज्ञान प्रलय । मदन ताल नाँहीं रे हम नाँहीं रे, सत्यराम सब माँहीं रे ॥ टेक ॥ नाँहीं धरणि अकाशा रे, नाँहीं पवन प्रकाशा रे। नाँहीं रवि शशि तारा रे, नहीं पावक प्रजारा रे ॥ 1 ॥ नाँहीं पाँच पसारा रे, नाँहीं सब संसारा रे। नहीं काया जीव हमारा रे, नहीं बाजी कौतिकहारा रे ॥ 2 ॥ नाँहीं तरवर छाया रे, नहीं पंखी नहीं माया रे। नाँहीं गिरिवर वासा रे, नाँहीं समंद निवासा रे ॥ 3 ॥ नाँहीं जल थल खंडा रे, नाँहीं सब ब्रह्मांडा रे। नाँहीं आदि अनंता रे, दादू राम रहंता रे ॥ 4 ॥ ३94. मध्य मार्ग निष्पक्ष । षट्ताल अलह कहो भावै राम कहो, डाल तजो सब मूल गहो ॥ टेक ॥ अलह राम कहि कर्म दहो, झूठे मारग कहा बहो ॥ 1 ॥ साधू संगति तो निबहो, आइ परै सो शीश सहो ॥ 2 ॥ काया कमल दिल लाइ रहो, अलख अलह दीदार लहो ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 सतगुरु की सुन सीख अहो, दादू पहुँचे पार पहो ॥ 4 ॥ 395. दादरा हिंदू तुरक न जानूं दोइ। सांई सबन का सोई है रे, और न दूजा देखूं कोइ ॥ टेक ॥ कीट पतंग सबै योनिन में, जल थल संग समाना सोइ। पीर पैगम्बर देवा दानव, मीर मलिक मुनिजन को मोहि ॥ 1 ॥ कर्ता है रे सोई चीन्हौं, जनि वै क्रोध करे रे कोइ। जैसे आरसी मंजन कीजे, राम रहीम देही तन धोइ ॥ 2 ॥ सांई केरी सेवा कीजे, पायो धन काहे को खोइ। दादू रे जन हरि जप लीजे,जन्म जन्म जे सुरिजन होइ ॥ 3 ॥ 396. मदन ताल को स्वामी को शेख कहै, इस दुनियां का मर्म न कोई लहै ॥ टेक ॥ कोई राम कोई अलह सुनावै, पुनि अलह राम का भेद न पावै ॥ 1 ॥ कोई हिन्दू कोई तुर्क कर मानै, पुनि हिन्दू तुर्क की खबर न जानै ॥ 2 ॥ यहु सब करणी दोनों वेद, समझ परी तब पाया भेद ॥ 3 ॥ दादू देखै आत्म एक, कहबा सुनबा अनन्त अनेक ॥ 4 ॥ 397. निन्दा। त्रिताल निन्दत है सब लोक विचारा, हमको भावै राम पियारा ॥ टेक ॥ निस्संशय निर्दोष लगावै, तातैं मोको अचरज आवै ॥ 1 ॥ दुविधा द्वै पख रहिता जे, तासन कहत गये रे ये ॥ 2 ॥ निर्बैरी निहकामी साध, ता सिर देत बहुत अपराध ॥ 3 ॥ लोहा कंचन एक समान, तासन कहत करत अभिमान ॥ 4 ॥ निन्दा औ स्तुति एकै तोलै, तासन कहैं अपवाद हि बोलै ॥ 5 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 दादू निन्दा ताको भावै, जाकै हिरदै राम न आवै ॥ 6 ॥ ३९४. (गुजराती) अनन्य शरण । उदीक्षण ताल महारूं सूं जेहूँ आपूं, ताहरूं छै तूंनें थापूं ॥ टेक ॥ सर्व जीव नें तूं दातार, तैं सिरज्या नें तूं प्रतिपाल ॥ 1 ॥ तन धन ताहरो तैं दीधो, हूँ ताहरो नें तैं कीधो ॥ 2 ॥ सहुवे ताहरो सांचो ये, मैं मैं माहरो झूठो ते ॥ 3 ॥ दादू नें मन और न आवे, तूं कर्ता ने तूं हि जु भावे ॥ 4 ॥ ३९९. निष्काम । उदीक्षण ताल ऐसा अवधू राम पियारा, प्राण पिंड तैं रहै नियारा ॥ टेक ॥ जल लग काया तब लग माया, रहै निरन्तर अवधू राया ॥ 1 ॥ अठ सिधि भाई नो निधि आई, निकट न जाई राम दुहाई ॥ 2 ॥ अमर अभय पद बैकुंठ बासा, छाया माया रहै उदासा ॥ 3 ॥ सांई सेवक सब दिखलावै, दादू दूजा दृष्टि न आवै ॥ 4 ॥ ५००. शूरातन कसौटी । भंगताल तूँ साहिब मैं सेवक तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥ भावै करवत सिर पर सार, भावै लेकर गरदन मार ॥ 1 ॥ भावै चहुँ दिशि अग्नि लगाइ, भावै काल दशों दिशि खाइ ॥ 2 ॥ भावै गिरिवर गगन गिराइ, भावै दरिया माँहि बहाइ ॥ 3 ॥ भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवक कस कस लेहु ॥ 4 ॥ ५०1. साधु । भंगताल काम क्रोध नहिं आवै मेरे, तातैं गोविन्द पाया नेरे ॥ टेक ॥ भरम कर्म जाल सब दीन्हा, रमता राम सबन में चीन्हा ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25


दुविधा दुर्मति दूरि गँवाई, राम रमत सांची मन आई ॥ २ ॥ नीच ऊँच मध्यम को नांही, देखूं राम सबन के मांही ॥ ३ ॥ दादू सांच सबन में सोई, पैंड पकर जन निर्भय होई ॥ ४ ॥

५०२. हित उपदेश। खेमटा ताल हाजिरां हजूर सांई, है हरि नेड़ा दूर नांही ॥ टेक ॥ मनी मेट महल में पावै, काहे खोजन दूरि जावै ॥ १ ॥ हिर्स न होइ, गुस्सा सब खाइ, तातैं संइयां दूर न जाइ ॥ २ ॥ दुई दूर दरोग न होइ, मालिक मन में देखै सोइ ॥ ३ ॥ अरि ये पाँच शोध सब मारै, तब दादू देखै निकटि विचारै ॥ ४ ॥

५०३. खेमटा ताल राम रमत है देखे न कोइ, जो देखे सो पावन होइ ॥ टेक ॥ बाहिर भीतर नेड़ा न दूर, स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥ १ ॥ जहां देखूं तहँ दूसर नांहि, सब घट राम समाना मांहि ॥ २ ॥ जहाँ जाऊँ तहँ सोई साथ, पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥ ३ ॥ दादू हरि देखे सुख होहि, निशदिन निरखन दीजे मोहि ॥ ४ ॥

५०४. अध्यात्म। एकताल मन पवन ले उनमन रहै, अगम निगम मूल सो लहै ॥ टेक ॥ पाँच वायु जे सहज समावै, शशिहर के घर आणै सूर। शीतल सदा मिलै सुखदाई, अनहद शब्द बजावै तूर ॥ १ ॥ बंकनालि सदा रस पीवै, तब यहु मनवा कहीं न जाइ। विकसै कमल प्रेम जब उपजै, ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥ २ ॥ बैस गुफा में ज्योति विचारै, तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ। अंतर आप मिलै अविनाशी, पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 जामण मरण जाइ, भव भाजै, अवरण के घर वरण समाइ । दादू जाय मिलै जगजीवन, तब यहु आवागमन विलाइ ॥ 4 ॥ 405. एक ताल जीवन मूरी मेरे आतम राम, भाग बड़े पायो निज ठाम ॥ टेक ॥ शब्द अनाहद उपजै जहाँ, सुषमन रंग लगावै तहाँ । तहँ रंग लागे निर्मल होइ, ये तत उपजे जानै सोइ ॥ 1 ॥ सरवर तहाँ हंसा रहे, कर स्नान सबै सुख लहै । सुखदाई को नैनहुँ जोइ, त्यों त्यों मन अति आनन्द होइ ॥ 2 ॥ सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ । पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥ 3 ॥ तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ, जा पर किरपा जानै सोइ । कृपा करि हरि देइ उमंग, तहँ जन पायो निर्भय संग ॥ 4 ॥ तब हंसा मन आनंद होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ । जा को हरि लखावै आप, ताहि न लिपैं पुन्य न पाप ॥ 5 ॥ तहँ अनहद बाजै अद्भुत खेल, दीपक जलै बाती बिन तेल । अखंड ज्योति तहँ भयो प्रकास, फाग बसंत ज्यों बारह मास ॥ 6 ॥ त्रय स्थान निरंतर निरधार, तहँ प्रभु बैठे समर्थ सार । नैनहुँ निरखूं तो सुख होइ, ताहि पुरुष को लखै न कोइ ॥ 7 ॥ ऐसा है हरि दीनदयाल, सेवक की जानें प्रतिपाल । चलु हंसा तहँ चरण समान, तहँ दादू पहुँचे परिवान ॥ 8 ॥ 406. आत्म परमात्म रास । एकताल घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥ गंगा जमना अंतर-वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ 1 ॥ कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 तहँ बिन बैना बाजैं तूर, विकसै कँवल चंद अरु सूर ॥ 3 ॥ पूरण ब्रह्म परम प्रकाश, तहँ निज देखै दादू दास ॥ 4 ॥ इति राग भैरूं सम्पूर्णम् ॥ 25 ॥ पद 34 ॥ दादूराम सत्यराम

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अथ राग ललित 26 (गायन समय प्रातः 3 से 6) ५०7. पराभक्ति । त्रिताल राम तूँ मोरा हौं तोरा, पाइन परत निहोरा ॥ टेक ॥ एकै संगैं वासा, तुम ठाकुर हम दासा ॥ 1 ॥ तन मन तुम कौं देबा, तेज पुंज हम लेबा ॥ 2 ॥ रस माँही रस होइबा, ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥ 3 ॥ ब्रह्म जीव का मेला, दादू नूर अकेला ॥ 4 ॥ ५०8. (मराठी) अनन्य शरण । त्रिताल मेरे गृह आव हो गुरु मेरा, मैं बालक सेवक तेरा ॥ टेक ॥ मात पिता तूँ अम्हचा स्वामी, देव हमारे अंतरजामी ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26 अम्हचा सज्जन अम्हचा बँधू, प्राण हमारे अम्हचा जिन्दू ॥ 2 ॥ अम्हचा प्रीतम अम्हचा मेला, अम्हची जीवन आप अकेला ॥ 3 ॥ अम्हचा साथी संग सनेही, राम बिना दुख दादू देही ॥ 4 ॥ ५०९. (गुजराती) हितोपदेश । गजताल वाहला माहरा ! प्रेम भक्ति रस पीजिये, रमिये रमता राम, माहरा वाहला रे । हिरदा कमल में राखिये, उत्तम एहज ठाम, माहरा वाहला रे ॥ टेक ॥ वाहला माहरा ! सतगुरु शरणे अणसरे, साधु समागम थाइ, माहरा वाहला रे । वाणी ब्रह्म बखानिये, आनन्द में दिन जाइ, माहरा वाहला रे ॥ 1 ॥ वाहला माहरा ! आतम अनुभव ऊपजे, ऊपजे ब्रह्म गियान, माहरा वाहला रे । सुख सागर में झूलिये, साचो येह स्नान, माहरा वाहला रे ॥ 2 ॥ वाहला माहरा ! भव बन्धन सब छूटिये, कर्म न लागे कोइ, माहरा वाहला रे । जीवन मुक्ति फल पामिये, अमर अभय पद होइ, माहरा वाहला रे ॥ 3 ॥ वाहला माहरा ! अठ सिधि नौ निधि आँगणे, परम पदारथ चार, माहरा वाहला रे । दादू जन देखे नहीं, रातो सिरजनहार, माहरा वाहला रे ॥ 4 ॥ ५१०. अखंड प्रीति । गजताल हमारो मन माई ! राम नाम रंग रातो । पिव पिव करै पीव को जानै, मगन रहै रस मातो ॥ टेक ॥ सदा सील संतोष सुहावत, चरण कँवल मन बाँधो । हिरदा माँही जतन कर राखूँ, मानों रंक धन लाधो ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26 प्रेम भक्ति प्रीति हरि जानूं, हरि सेवा सुखदाई । ज्ञान ध्यान मोहन को मेरे, कंप न लागे काई ॥ 2 ॥ संगि सदा हेत हरि लागो, अंगि और नहिं आवे । दादू दीन दयाल दमोदर, सार सुधा रस भावे ॥ 3 ॥ ५11. (फारसी) साहिब सिफत। राज मृगांक ताल महरवान, महरवान! आब बाद खाक आतिश, आदम नीशान ॥ टेक ॥ शीश पाँव हाथ कीये, नैन कीये कान। मुख कीया जीव दीया, राजिक रहमान ॥ 1 ॥ मादर पिदर परदः पोश, सांई सुबहान। संग रहै दस्त गहै, साहिब सुलतान ॥ 2 ॥ या करीम या रहीम, दाना तूँ दीवान। पाक नूर है हजूर, दादू है हैरान ॥ 3 ॥ इति राग ललित सम्पूर्ण ॥ 26 ॥ पद 5 ॥

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राग जैतश्री अथ राग जैत श्री 27 (गायन समय दिन 3 से 6) 412. अमिट नाम विनती । पंजाबी त्रिताल तेरे नाम की बलि जाऊँ, जहाँ रहूँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥ तेरे बैनों की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी । तेरी मूरति की बलि कीती, वारि-वारि हौं दीती ॥ 1 ॥ शोभित नूर तुम्हारा, सुन्दर ज्योति उजारा । मीठा प्राण पियारा, तूं है पीव हमारा ॥ 2 ॥ तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये । दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग जैत श्री 27

५13. विरह विनती । पंजाबी त्रिताल मेरे जीव की जानै जानराइ, तुमतैं सेवक कहा दुराइ ॥ टेक ॥ जल बिन जैसे जाइ जिय तलफत, तुम्ह बिन तैसे हमहु विहाइ ॥ 1 ॥ तन मन व्याकुल होइ विरहनी, दरश पियासी प्राण जाइ ॥ 2 ॥ जैसे चित्त चकोर चंद मन, ऐसे मोहन हमहि आहि ॥ 3 ॥ विरह अगनि दहत दादू को, दर्शन परसन तनहि सिराइ ॥ 4 ॥ इति राग जैत श्री सम्पूर्ण ॥ 27 ॥ पद 2 ॥

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राग धनाश्री www.dadooram.org अथ राग धना श्री २४ (गायन समय दिन ३ से ६) ५14. अमिट अविनाशी रंग । धीमा ताल रंग लागो रे राम को, सो रंग कदे न जाई रे । हरि रंग मेरो मन रंग्यो, और न रंग सुहाई रे ।। टेक ।। अविनाशी रंग ऊपनो, रच मच लागो चोलो रे । सो रंग सदा सुहावनो, ऐसो रंग अमोलो रे ।। 1 ।। हरि रंग कदे न ऊतरै, दिन दिन होइ सुरंगो रे । नित नवो निरवाण है, कदे न ह्वैला भंगो रे ।। 2 ।। सांचो रंग सहजैं मिल्यो, सुन्दर रंग अपारो रे । भाग बिना क्यों पाइये, सब रंग मांहीं सारो रे ।। 3 ।। अवरण को का वरणिये, सो रंग सहज स्वरूपो रे ।

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