सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 सतगुरु की सुन सीख अहो, दादू पहुँचे पार पहो ॥ 4 ॥ 395. दादरा हिंदू तुरक न जानूं दोइ। सांई सबन का सोई है रे, और न दूजा देखूं कोइ ॥ टेक ॥ कीट पतंग सबै योनिन में, जल थल संग समाना सोइ। पीर पैगम्बर देवा दानव, मीर मलिक मुनिजन को मोहि ॥ 1 ॥ कर्ता है रे सोई चीन्हौं, जनि वै क्रोध करे रे कोइ। जैसे आरसी मंजन कीजे, राम रहीम देही तन धोइ ॥ 2 ॥ सांई केरी सेवा कीजे, पायो धन काहे को खोइ। दादू रे जन हरि जप लीजे,जन्म जन्म जे सुरिजन होइ ॥ 3 ॥ 396. मदन ताल को स्वामी को शेख कहै, इस दुनियां का मर्म न कोई लहै ॥ टेक ॥ कोई राम कोई अलह सुनावै, पुनि अलह राम का भेद न पावै ॥ 1 ॥ कोई हिन्दू कोई तुर्क कर मानै, पुनि हिन्दू तुर्क की खबर न जानै ॥ 2 ॥ यहु सब करणी दोनों वेद, समझ परी तब पाया भेद ॥ 3 ॥ दादू देखै आत्म एक, कहबा सुनबा अनन्त अनेक ॥ 4 ॥ 397. निन्दा। त्रिताल निन्दत है सब लोक विचारा, हमको भावै राम पियारा ॥ टेक ॥ निस्संशय निर्दोष लगावै, तातैं मोको अचरज आवै ॥ 1 ॥ दुविधा द्वै पख रहिता जे, तासन कहत गये रे ये ॥ 2 ॥ निर्बैरी निहकामी साध, ता सिर देत बहुत अपराध ॥ 3 ॥ लोहा कंचन एक समान, तासन कहत करत अभिमान ॥ 4 ॥ निन्दा औ स्तुति एकै तोलै, तासन कहैं अपवाद हि बोलै ॥ 5 ॥
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