सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि । दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥ 8 ॥ ३9२. जीवित मृतक । एकताल जब यहु मैं मैं मेरी जाइ, तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥ टेक ॥ मैं मैं मेरी तब लग दूर, मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥ 1 ॥ मैं मैं मेरी तब लग नांहि, मैं मैं मेटि मिलै मन माँहि ॥ 2 ॥ मैं मैं मेरी न पावै कोइ, मैं मैं मेटि मिलै जन सोइ ॥ 3 ॥ दादू मैं मैं मेरी मेटि, तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥ 4 ॥ ३9३. ज्ञान प्रलय । मदन ताल नाँहीं रे हम नाँहीं रे, सत्यराम सब माँहीं रे ॥ टेक ॥ नाँहीं धरणि अकाशा रे, नाँहीं पवन प्रकाशा रे। नाँहीं रवि शशि तारा रे, नहीं पावक प्रजारा रे ॥ 1 ॥ नाँहीं पाँच पसारा रे, नाँहीं सब संसारा रे। नहीं काया जीव हमारा रे, नहीं बाजी कौतिकहारा रे ॥ 2 ॥ नाँहीं तरवर छाया रे, नहीं पंखी नहीं माया रे। नाँहीं गिरिवर वासा रे, नाँहीं समंद निवासा रे ॥ 3 ॥ नाँहीं जल थल खंडा रे, नाँहीं सब ब्रह्मांडा रे। नाँहीं आदि अनंता रे, दादू राम रहंता रे ॥ 4 ॥ ३94. मध्य मार्ग निष्पक्ष । षट्ताल अलह कहो भावै राम कहो, डाल तजो सब मूल गहो ॥ टेक ॥ अलह राम कहि कर्म दहो, झूठे मारग कहा बहो ॥ 1 ॥ साधू संगति तो निबहो, आइ परै सो शीश सहो ॥ 2 ॥ काया कमल दिल लाइ रहो, अलख अलह दीदार लहो ॥ 3 ॥
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