सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ऐसो अलख अनंत अपारा, तीन लोक जाको विस्तारा ॥ टेक ॥ निर्मल सदा सहज घर रहै, ताको पार न कोई लहै। निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ, निश्चल सदा न आवै जाइ ॥ 1 ॥ अविनाशी है अपरंपार, आदि अनंत रहै निरधार। पावन सदा निरंतर आप, कला अतीत लिप्त नहिं पाप ॥ 2 ॥ समर्थ सोई सकल भरपूर, बाहर भीतर नेडा न दूर। अकल आप कलै नहीं कोई, सब घट रह्यो निरंजन होई ॥ 3 ॥ अवरण आपै अजर अलेख, अगम अगाध रूप नहिं रेख। अविगत की गति लखी न जाइ, दादू दीन ताहि चित्त लाइ ॥ 4 ॥ 391. समर्थ लीला । तिलवाड़ा ऐसो राजा सेऊँ ताहि, और अनेक सब लागे जाहि ॥ टेक ॥ तीन लोक ग्रह धरे रचाइ, चंद सूर दोऊ दीपक लाइ। पवन बुहारे गृह आँगणां, छपन कोटि जल जाके घरां ॥ 1 ॥ राते सेवा शंकर देव, ब्रह्म कुलाल न जानै भेव। कीरति करणा चारों वेद, नेति नेति न विजाणै भेद ॥ 2 ॥ सकल देवपति सेवा करैं, मुनि अनेक एक चित्त धरैं। चित्र विचित्र लिखैं दरबार, धर्मराइ ठाढ़े गुण सार ॥ 3 ॥ रिधि सिधि दासी आगे रहैं, चार पदारथ जी जी कहैं। सकल सिद्ध रहैं ल्यौ लाइ, सब परिपूरण ऐसो राइ ॥ 4 ॥ खलक खजीना भरे भंडार, ता घर बरतै सब संसार। पूरि दीवान सहज सब दे, सदा निरंजन ऐसो है ॥ 5 ॥ नारद गावैं गुण गोविन्द, करैं शारदा सब ही छंद। नटवर नाचै कला अनेक, आपन देखै चरित अलेख ॥ 6 ॥ सकल साध बाजैं नीशान, जै जैकार न मेटै आन। मालिनी पुहुप अठारह भार, आपण दाता सिरजनहार ॥ 7 ॥
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