सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
सहजैं मन मथिया तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥ 5 ॥ 387. उपदेश । धीमा ताल मन मैला मन ही सौं धोइ, उनमनि लागै निर्मल होइ ॥ टेक ॥ मन ही उपजै विषय विकार, मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥ 1 ॥ मन ही दुविधा नाना भेद, मन ही समझै द्वै पख छेद ॥ 2 ॥ मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥ 3 ॥ मन ही उपजै अग्नि शरीर, मन ही शीतल निर्मल नीर ॥ 4 ॥ मन उपदेश मनही समझाइ, दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥ 5 ॥ 388. मन प्रति शूरातन । धीमा ताल रहु रे रहु मन मारूंगा, रती रती कर डारूंगा ॥ टेक ॥ खंड खंड कर नाखूंगा, जहाँ राम तहाँ राखूंगा ॥ 1 ॥ कह्या न मानै मेरा, सिर भानूंगा तेरा ॥ 2 ॥ घर में कदे न आवै, बाहर को उठि धावै ॥ 3 ॥ आतम राम न जानै, मेरा कह्या न मानै ॥ 4 ॥ दादू गुरुमुखि पूरा, मन सौं जूझै शूरा ॥ 5 ॥ 389. नाम शूरातन । मकरन्द ताल निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥ टेक ॥ सेवक शूर शंक नही मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥ 1 ॥ नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥ 2 ॥ सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥ 3 ॥ हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥ 4 ॥ 390. समर्थाई । प्रतिपाल
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