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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25

सहजैं मन मथिया तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥ 5 ॥ 387. उपदेश । धीमा ताल मन मैला मन ही सौं धोइ, उनमनि लागै निर्मल होइ ॥ टेक ॥ मन ही उपजै विषय विकार, मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥ 1 ॥ मन ही दुविधा नाना भेद, मन ही समझै द्वै पख छेद ॥ 2 ॥ मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥ 3 ॥ मन ही उपजै अग्नि शरीर, मन ही शीतल निर्मल नीर ॥ 4 ॥ मन उपदेश मनही समझाइ, दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥ 5 ॥ 388. मन प्रति शूरातन । धीमा ताल रहु रे रहु मन मारूंगा, रती रती कर डारूंगा ॥ टेक ॥ खंड खंड कर नाखूंगा, जहाँ राम तहाँ राखूंगा ॥ 1 ॥ कह्या न मानै मेरा, सिर भानूंगा तेरा ॥ 2 ॥ घर में कदे न आवै, बाहर को उठि धावै ॥ 3 ॥ आतम राम न जानै, मेरा कह्या न मानै ॥ 4 ॥ दादू गुरुमुखि पूरा, मन सौं जूझै शूरा ॥ 5 ॥ 389. नाम शूरातन । मकरन्द ताल निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥ टेक ॥ सेवक शूर शंक नही मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥ 1 ॥ नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥ 2 ॥ सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥ 3 ॥ हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥ 4 ॥ 390. समर्थाई । प्रतिपाल

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ऐसो अलख अनंत अपारा, तीन लोक जाको विस्तारा ॥ टेक ॥ निर्मल सदा सहज घर रहै, ताको पार न कोई लहै। निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ, निश्चल सदा न आवै जाइ ॥ 1 ॥ अविनाशी है अपरंपार, आदि अनंत रहै निरधार। पावन सदा निरंतर आप, कला अतीत लिप्त नहिं पाप ॥ 2 ॥ समर्थ सोई सकल भरपूर, बाहर भीतर नेडा न दूर। अकल आप कलै नहीं कोई, सब घट रह्यो निरंजन होई ॥ 3 ॥ अवरण आपै अजर अलेख, अगम अगाध रूप नहिं रेख। अविगत की गति लखी न जाइ, दादू दीन ताहि चित्त लाइ ॥ 4 ॥ 391. समर्थ लीला । तिलवाड़ा ऐसो राजा सेऊँ ताहि, और अनेक सब लागे जाहि ॥ टेक ॥ तीन लोक ग्रह धरे रचाइ, चंद सूर दोऊ दीपक लाइ। पवन बुहारे गृह आँगणां, छपन कोटि जल जाके घरां ॥ 1 ॥ राते सेवा शंकर देव, ब्रह्म कुलाल न जानै भेव। कीरति करणा चारों वेद, नेति नेति न विजाणै भेद ॥ 2 ॥ सकल देवपति सेवा करैं, मुनि अनेक एक चित्त धरैं। चित्र विचित्र लिखैं दरबार, धर्मराइ ठाढ़े गुण सार ॥ 3 ॥ रिधि सिधि दासी आगे रहैं, चार पदारथ जी जी कहैं। सकल सिद्ध रहैं ल्यौ लाइ, सब परिपूरण ऐसो राइ ॥ 4 ॥ खलक खजीना भरे भंडार, ता घर बरतै सब संसार। पूरि दीवान सहज सब दे, सदा निरंजन ऐसो है ॥ 5 ॥ नारद गावैं गुण गोविन्द, करैं शारदा सब ही छंद। नटवर नाचै कला अनेक, आपन देखै चरित अलेख ॥ 6 ॥ सकल साध बाजैं नीशान, जै जैकार न मेटै आन। मालिनी पुहुप अठारह भार, आपण दाता सिरजनहार ॥ 7 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि । दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥ 8 ॥ ३9२. जीवित मृतक । एकताल जब यहु मैं मैं मेरी जाइ, तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥ टेक ॥ मैं मैं मेरी तब लग दूर, मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥ 1 ॥ मैं मैं मेरी तब लग नांहि, मैं मैं मेटि मिलै मन माँहि ॥ 2 ॥ मैं मैं मेरी न पावै कोइ, मैं मैं मेटि मिलै जन सोइ ॥ 3 ॥ दादू मैं मैं मेरी मेटि, तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥ 4 ॥ ३9३. ज्ञान प्रलय । मदन ताल नाँहीं रे हम नाँहीं रे, सत्यराम सब माँहीं रे ॥ टेक ॥ नाँहीं धरणि अकाशा रे, नाँहीं पवन प्रकाशा रे। नाँहीं रवि शशि तारा रे, नहीं पावक प्रजारा रे ॥ 1 ॥ नाँहीं पाँच पसारा रे, नाँहीं सब संसारा रे। नहीं काया जीव हमारा रे, नहीं बाजी कौतिकहारा रे ॥ 2 ॥ नाँहीं तरवर छाया रे, नहीं पंखी नहीं माया रे। नाँहीं गिरिवर वासा रे, नाँहीं समंद निवासा रे ॥ 3 ॥ नाँहीं जल थल खंडा रे, नाँहीं सब ब्रह्मांडा रे। नाँहीं आदि अनंता रे, दादू राम रहंता रे ॥ 4 ॥ ३94. मध्य मार्ग निष्पक्ष । षट्ताल अलह कहो भावै राम कहो, डाल तजो सब मूल गहो ॥ टेक ॥ अलह राम कहि कर्म दहो, झूठे मारग कहा बहो ॥ 1 ॥ साधू संगति तो निबहो, आइ परै सो शीश सहो ॥ 2 ॥ काया कमल दिल लाइ रहो, अलख अलह दीदार लहो ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 सतगुरु की सुन सीख अहो, दादू पहुँचे पार पहो ॥ 4 ॥ 395. दादरा हिंदू तुरक न जानूं दोइ। सांई सबन का सोई है रे, और न दूजा देखूं कोइ ॥ टेक ॥ कीट पतंग सबै योनिन में, जल थल संग समाना सोइ। पीर पैगम्बर देवा दानव, मीर मलिक मुनिजन को मोहि ॥ 1 ॥ कर्ता है रे सोई चीन्हौं, जनि वै क्रोध करे रे कोइ। जैसे आरसी मंजन कीजे, राम रहीम देही तन धोइ ॥ 2 ॥ सांई केरी सेवा कीजे, पायो धन काहे को खोइ। दादू रे जन हरि जप लीजे,जन्म जन्म जे सुरिजन होइ ॥ 3 ॥ 396. मदन ताल को स्वामी को शेख कहै, इस दुनियां का मर्म न कोई लहै ॥ टेक ॥ कोई राम कोई अलह सुनावै, पुनि अलह राम का भेद न पावै ॥ 1 ॥ कोई हिन्दू कोई तुर्क कर मानै, पुनि हिन्दू तुर्क की खबर न जानै ॥ 2 ॥ यहु सब करणी दोनों वेद, समझ परी तब पाया भेद ॥ 3 ॥ दादू देखै आत्म एक, कहबा सुनबा अनन्त अनेक ॥ 4 ॥ 397. निन्दा। त्रिताल निन्दत है सब लोक विचारा, हमको भावै राम पियारा ॥ टेक ॥ निस्संशय निर्दोष लगावै, तातैं मोको अचरज आवै ॥ 1 ॥ दुविधा द्वै पख रहिता जे, तासन कहत गये रे ये ॥ 2 ॥ निर्बैरी निहकामी साध, ता सिर देत बहुत अपराध ॥ 3 ॥ लोहा कंचन एक समान, तासन कहत करत अभिमान ॥ 4 ॥ निन्दा औ स्तुति एकै तोलै, तासन कहैं अपवाद हि बोलै ॥ 5 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 दादू निन्दा ताको भावै, जाकै हिरदै राम न आवै ॥ 6 ॥ ३९४. (गुजराती) अनन्य शरण । उदीक्षण ताल महारूं सूं जेहूँ आपूं, ताहरूं छै तूंनें थापूं ॥ टेक ॥ सर्व जीव नें तूं दातार, तैं सिरज्या नें तूं प्रतिपाल ॥ 1 ॥ तन धन ताहरो तैं दीधो, हूँ ताहरो नें तैं कीधो ॥ 2 ॥ सहुवे ताहरो सांचो ये, मैं मैं माहरो झूठो ते ॥ 3 ॥ दादू नें मन और न आवे, तूं कर्ता ने तूं हि जु भावे ॥ 4 ॥ ३९९. निष्काम । उदीक्षण ताल ऐसा अवधू राम पियारा, प्राण पिंड तैं रहै नियारा ॥ टेक ॥ जल लग काया तब लग माया, रहै निरन्तर अवधू राया ॥ 1 ॥ अठ सिधि भाई नो निधि आई, निकट न जाई राम दुहाई ॥ 2 ॥ अमर अभय पद बैकुंठ बासा, छाया माया रहै उदासा ॥ 3 ॥ सांई सेवक सब दिखलावै, दादू दूजा दृष्टि न आवै ॥ 4 ॥ ५००. शूरातन कसौटी । भंगताल तूँ साहिब मैं सेवक तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥ भावै करवत सिर पर सार, भावै लेकर गरदन मार ॥ 1 ॥ भावै चहुँ दिशि अग्नि लगाइ, भावै काल दशों दिशि खाइ ॥ 2 ॥ भावै गिरिवर गगन गिराइ, भावै दरिया माँहि बहाइ ॥ 3 ॥ भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवक कस कस लेहु ॥ 4 ॥ ५०1. साधु । भंगताल काम क्रोध नहिं आवै मेरे, तातैं गोविन्द पाया नेरे ॥ टेक ॥ भरम कर्म जाल सब दीन्हा, रमता राम सबन में चीन्हा ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25


दुविधा दुर्मति दूरि गँवाई, राम रमत सांची मन आई ॥ २ ॥ नीच ऊँच मध्यम को नांही, देखूं राम सबन के मांही ॥ ३ ॥ दादू सांच सबन में सोई, पैंड पकर जन निर्भय होई ॥ ४ ॥

५०२. हित उपदेश। खेमटा ताल हाजिरां हजूर सांई, है हरि नेड़ा दूर नांही ॥ टेक ॥ मनी मेट महल में पावै, काहे खोजन दूरि जावै ॥ १ ॥ हिर्स न होइ, गुस्सा सब खाइ, तातैं संइयां दूर न जाइ ॥ २ ॥ दुई दूर दरोग न होइ, मालिक मन में देखै सोइ ॥ ३ ॥ अरि ये पाँच शोध सब मारै, तब दादू देखै निकटि विचारै ॥ ४ ॥

५०३. खेमटा ताल राम रमत है देखे न कोइ, जो देखे सो पावन होइ ॥ टेक ॥ बाहिर भीतर नेड़ा न दूर, स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥ १ ॥ जहां देखूं तहँ दूसर नांहि, सब घट राम समाना मांहि ॥ २ ॥ जहाँ जाऊँ तहँ सोई साथ, पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥ ३ ॥ दादू हरि देखे सुख होहि, निशदिन निरखन दीजे मोहि ॥ ४ ॥

५०४. अध्यात्म। एकताल मन पवन ले उनमन रहै, अगम निगम मूल सो लहै ॥ टेक ॥ पाँच वायु जे सहज समावै, शशिहर के घर आणै सूर। शीतल सदा मिलै सुखदाई, अनहद शब्द बजावै तूर ॥ १ ॥ बंकनालि सदा रस पीवै, तब यहु मनवा कहीं न जाइ। विकसै कमल प्रेम जब उपजै, ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥ २ ॥ बैस गुफा में ज्योति विचारै, तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ। अंतर आप मिलै अविनाशी, पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 जामण मरण जाइ, भव भाजै, अवरण के घर वरण समाइ । दादू जाय मिलै जगजीवन, तब यहु आवागमन विलाइ ॥ 4 ॥ 405. एक ताल जीवन मूरी मेरे आतम राम, भाग बड़े पायो निज ठाम ॥ टेक ॥ शब्द अनाहद उपजै जहाँ, सुषमन रंग लगावै तहाँ । तहँ रंग लागे निर्मल होइ, ये तत उपजे जानै सोइ ॥ 1 ॥ सरवर तहाँ हंसा रहे, कर स्नान सबै सुख लहै । सुखदाई को नैनहुँ जोइ, त्यों त्यों मन अति आनन्द होइ ॥ 2 ॥ सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ । पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥ 3 ॥ तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ, जा पर किरपा जानै सोइ । कृपा करि हरि देइ उमंग, तहँ जन पायो निर्भय संग ॥ 4 ॥ तब हंसा मन आनंद होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ । जा को हरि लखावै आप, ताहि न लिपैं पुन्य न पाप ॥ 5 ॥ तहँ अनहद बाजै अद्भुत खेल, दीपक जलै बाती बिन तेल । अखंड ज्योति तहँ भयो प्रकास, फाग बसंत ज्यों बारह मास ॥ 6 ॥ त्रय स्थान निरंतर निरधार, तहँ प्रभु बैठे समर्थ सार । नैनहुँ निरखूं तो सुख होइ, ताहि पुरुष को लखै न कोइ ॥ 7 ॥ ऐसा है हरि दीनदयाल, सेवक की जानें प्रतिपाल । चलु हंसा तहँ चरण समान, तहँ दादू पहुँचे परिवान ॥ 8 ॥ 406. आत्म परमात्म रास । एकताल घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥ गंगा जमना अंतर-वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ 1 ॥ कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 तहँ बिन बैना बाजैं तूर, विकसै कँवल चंद अरु सूर ॥ 3 ॥ पूरण ब्रह्म परम प्रकाश, तहँ निज देखै दादू दास ॥ 4 ॥ इति राग भैरूं सम्पूर्णम् ॥ 25 ॥ पद 34 ॥ दादूराम सत्यराम

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अथ राग ललित 26 (गायन समय प्रातः 3 से 6) ५०7. पराभक्ति । त्रिताल राम तूँ मोरा हौं तोरा, पाइन परत निहोरा ॥ टेक ॥ एकै संगैं वासा, तुम ठाकुर हम दासा ॥ 1 ॥ तन मन तुम कौं देबा, तेज पुंज हम लेबा ॥ 2 ॥ रस माँही रस होइबा, ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥ 3 ॥ ब्रह्म जीव का मेला, दादू नूर अकेला ॥ 4 ॥ ५०8. (मराठी) अनन्य शरण । त्रिताल मेरे गृह आव हो गुरु मेरा, मैं बालक सेवक तेरा ॥ टेक ॥ मात पिता तूँ अम्हचा स्वामी, देव हमारे अंतरजामी ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26 अम्हचा सज्जन अम्हचा बँधू, प्राण हमारे अम्हचा जिन्दू ॥ 2 ॥ अम्हचा प्रीतम अम्हचा मेला, अम्हची जीवन आप अकेला ॥ 3 ॥ अम्हचा साथी संग सनेही, राम बिना दुख दादू देही ॥ 4 ॥ ५०९. (गुजराती) हितोपदेश । गजताल वाहला माहरा ! प्रेम भक्ति रस पीजिये, रमिये रमता राम, माहरा वाहला रे । हिरदा कमल में राखिये, उत्तम एहज ठाम, माहरा वाहला रे ॥ टेक ॥ वाहला माहरा ! सतगुरु शरणे अणसरे, साधु समागम थाइ, माहरा वाहला रे । वाणी ब्रह्म बखानिये, आनन्द में दिन जाइ, माहरा वाहला रे ॥ 1 ॥ वाहला माहरा ! आतम अनुभव ऊपजे, ऊपजे ब्रह्म गियान, माहरा वाहला रे । सुख सागर में झूलिये, साचो येह स्नान, माहरा वाहला रे ॥ 2 ॥ वाहला माहरा ! भव बन्धन सब छूटिये, कर्म न लागे कोइ, माहरा वाहला रे । जीवन मुक्ति फल पामिये, अमर अभय पद होइ, माहरा वाहला रे ॥ 3 ॥ वाहला माहरा ! अठ सिधि नौ निधि आँगणे, परम पदारथ चार, माहरा वाहला रे । दादू जन देखे नहीं, रातो सिरजनहार, माहरा वाहला रे ॥ 4 ॥ ५१०. अखंड प्रीति । गजताल हमारो मन माई ! राम नाम रंग रातो । पिव पिव करै पीव को जानै, मगन रहै रस मातो ॥ टेक ॥ सदा सील संतोष सुहावत, चरण कँवल मन बाँधो । हिरदा माँही जतन कर राखूँ, मानों रंक धन लाधो ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26 प्रेम भक्ति प्रीति हरि जानूं, हरि सेवा सुखदाई । ज्ञान ध्यान मोहन को मेरे, कंप न लागे काई ॥ 2 ॥ संगि सदा हेत हरि लागो, अंगि और नहिं आवे । दादू दीन दयाल दमोदर, सार सुधा रस भावे ॥ 3 ॥ ५11. (फारसी) साहिब सिफत। राज मृगांक ताल महरवान, महरवान! आब बाद खाक आतिश, आदम नीशान ॥ टेक ॥ शीश पाँव हाथ कीये, नैन कीये कान। मुख कीया जीव दीया, राजिक रहमान ॥ 1 ॥ मादर पिदर परदः पोश, सांई सुबहान। संग रहै दस्त गहै, साहिब सुलतान ॥ 2 ॥ या करीम या रहीम, दाना तूँ दीवान। पाक नूर है हजूर, दादू है हैरान ॥ 3 ॥ इति राग ललित सम्पूर्ण ॥ 26 ॥ पद 5 ॥

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राग जैतश्री अथ राग जैत श्री 27 (गायन समय दिन 3 से 6) 412. अमिट नाम विनती । पंजाबी त्रिताल तेरे नाम की बलि जाऊँ, जहाँ रहूँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥ तेरे बैनों की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी । तेरी मूरति की बलि कीती, वारि-वारि हौं दीती ॥ 1 ॥ शोभित नूर तुम्हारा, सुन्दर ज्योति उजारा । मीठा प्राण पियारा, तूं है पीव हमारा ॥ 2 ॥ तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये । दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग जैत श्री 27

५13. विरह विनती । पंजाबी त्रिताल मेरे जीव की जानै जानराइ, तुमतैं सेवक कहा दुराइ ॥ टेक ॥ जल बिन जैसे जाइ जिय तलफत, तुम्ह बिन तैसे हमहु विहाइ ॥ 1 ॥ तन मन व्याकुल होइ विरहनी, दरश पियासी प्राण जाइ ॥ 2 ॥ जैसे चित्त चकोर चंद मन, ऐसे मोहन हमहि आहि ॥ 3 ॥ विरह अगनि दहत दादू को, दर्शन परसन तनहि सिराइ ॥ 4 ॥ इति राग जैत श्री सम्पूर्ण ॥ 27 ॥ पद 2 ॥

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राग धनाश्री www.dadooram.org अथ राग धना श्री २४ (गायन समय दिन ३ से ६) ५14. अमिट अविनाशी रंग । धीमा ताल रंग लागो रे राम को, सो रंग कदे न जाई रे । हरि रंग मेरो मन रंग्यो, और न रंग सुहाई रे ।। टेक ।। अविनाशी रंग ऊपनो, रच मच लागो चोलो रे । सो रंग सदा सुहावनो, ऐसो रंग अमोलो रे ।। 1 ।। हरि रंग कदे न ऊतरै, दिन दिन होइ सुरंगो रे । नित नवो निरवाण है, कदे न ह्वैला भंगो रे ।। 2 ।। सांचो रंग सहजैं मिल्यो, सुन्दर रंग अपारो रे । भाग बिना क्यों पाइये, सब रंग मांहीं सारो रे ।। 3 ।। अवरण को का वरणिये, सो रंग सहज स्वरूपो रे ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 बलिहारी उस रंग की, जन दादू देख अनूपो रे ॥ 4 ॥ 415. धीमा ताल लाग रह्यो मन राम सौं, अब अनतैं नहिं जाये रे। अचला सौं थिर है रह्यो, सकै न चित्त डुलाये रे ॥ टेक ॥ ज्यों फुर्निंग चंदन रहै, परिमल रहै लुभाये रे। त्यूँ मन मेरा राम सौं, अब की बेर अघाये रे ॥ 1 ॥ भँवर न छाड़ै बास को, कँवल हि रह्यो बँधाये रे। त्यूं मन मेरा राम सौं, वेध रह्यो चित्त लाये रे ॥ 2 ॥ जल बिन मीन न जीवई, विछुरत ही मर जाये रे। त्यों मन मेरा राम सौं, ऐसी प्रीति बनाये रे ॥ 3 ॥ ज्यूं चातक जल को रटै, पीव पीव करत बिहाये रे। त्यों मन मेरा राम सौं, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥ 416. विनती । वीर विक्रम ताल मनमोहन हो ! कठिन विरह की पीर, सुन्दर दरस दिखाइये ॥ टेक ॥ सुनहु न दीन दयाल, तव मुख बैन सुनाइये ॥ 1 ॥ करुणामय कृपाल, सकल शिरोमणि आइये ॥ 2 ॥ मम जीवन प्राण अधार, अविनाशी उर लाइये ॥ 3 ॥ इब हरि दरसन देहु, दादू प्रेम बढ़ाइये ॥ 4 ॥ 417. वीर विक्रम ताल कतहूँ रहे हो विदेश, हरि नहिं आये हो। जन्म सिरानों जाइ, पीव नहिं पाये हो ॥ टेक ॥ विपति हमारी जाइ, हरि सौं को कहे हो।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 तुम्ह बिन नाथ अनाथ, विरहनि क्यों रहे हो ॥ 1 ॥ पीव के विरह वियोग, तन की सुधि नहीं हो। तलफि तलफि जीव जाइ, मृतक ह्वै रही हो ॥ 2 ॥ दुखित भई हम नारि, कब हरि आवे हो । तुम्ह बिन प्राण अधार, जीव दुख पावे हो ॥ 3 ॥ प्रगटहु दीनदयाल, विलम्ब न कीजिये हो । दादू दुखी बेहाल, दरसन दीजिये हो ॥ 4 ॥ ५18. रंग ताल सुरजन मेरा वे ! कीहैं पार लहाऊँ। जे सुरजन घर आवै वे, हिक कहाण कहाऊँ ॥ टेक॥ तो बाजैं मेकौं चैन न आवै, ये दुख कींह कहाऊँ। तो बाजैं मेकौं नींद न आवै, अँखियाँ नीर भराऊँ ॥ 1 ॥ जे तूँ मेकौं सुरजन डेवै, सो हौं शीश सहाऊँ। ये जन दादू सुरजन आवै, दरगह सेव कराऊँ ॥ 2 ॥ ५19. रंग ताल मोहन माधव कब मिलै, सकल शिरोमणि राइ। तन मन व्याकुल होत है, दरस दिखाओ आइ ॥ टेक॥ नैन रहे पथ जोवताँ, रोवत रैनि बिहाइ। बाल सनेही कब मिलै, मोपै रह्या न जाइ ॥ 1 ॥ छिन-छिन अंग अनल दहै, हरिजी कब मिलि हैं आइ। अंतरजामी जान कर, मेरे तन की तप्त बुझाइ ॥ 2 ॥ तुम दाता सुख देत हो, हाँ हो सुन दीनदयाल। चाहैं नैन उतावले, हाँ हो कब देखूं लाल ॥ 3 ॥ चरन कमल कब देख हौं, हाँ हो सन्मुख सिरजनहार।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 सांई संग सदा रहौं, हाँ हो तब भाग हमार ॥ 4 ॥ जीवनि मेरी जब मिलै, हाँ हो तब ही सुख होइ । तन मन में तूं ही बसै, हाँ हो कब देखूं सोइ ॥ 5 ॥ तन मन की तूं ही लखै, हाँ हो सुन चतुर सुजान । तुम देखे बिन क्यों रहौं, हाँ हो मोहि लागे बान ॥ 6 ॥ बिन देखे दुख पाइये, हाँ हो इब विलम्ब न लाइ । दादू दरशन कारणैं, हाँ हो सुख दीजे आइ ॥ 7 ॥ ५२०. (सिंधी) वैराग्य । वर्ण भिन्न ताल ये खूहि पयें सब भोग विलासन, तैसेहु वाझौं छत्र सिंहासन ॥ टेक॥ जन तिहुंरा बहिश्त नहिं भावे, लाल पलिंग क्या कीजे । भाहि लगे इह सेज सुखासन, मेकौं देखण दीजे ॥ 1 ॥ बैकुंठ मुक्ति स्वर्ग क्या कीजे, सकल भुवन नहिं भावे । भठी पयें सब मंडप छाजे, जे घर कंत न आवे ॥ 2 ॥ लोक अनंत अभै क्या कीजे, मैं विरहीजन तेरा । दादू दरशन देखण दीजे, ये सुन साहिब मेरा ॥ 3 ॥ ५२१. (फारसी) ईमान साबित । (राग काफी) राज मृगांक ताल अल्लह आशिकाँ ईमान, बहिश्त दोजख दीन दुनियां, चे कारे रहमान ॥ टेक॥ मीर मीरी पीर पीरी, फरिश्तः फरमान । आब आतिश अर्श कुर्सी, दीदनी दीवान ॥ 1 ॥ हरदो आलम खलक खाना, मोमिना इसलाम । हजां हाजी क़ज़ा क़ाज़ी, खान तूं सुलतान ॥ 2 ॥ इल्म आलम मुल्क मालुम, हाजते हैरान । अजब यारां खबरदारां, सूरते सुबहान ॥ 3 ॥

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अव्वल आखिर एक तूँ ही, जिन्द है कुरबान । आशिकां दीदार दादू, नूर का नीशान ॥ 4 ॥ 422. (फारसी) विरह विनती। (राग काफी) वर्ण भिन्न ताल अल्लह तेरा ज़िकर फ़िकर करते हैं, आशिकां मुश्ताक तेरे, तर्स तर्स मरते हैं ॥ टेक ॥ खलक खेश दिगर नेस्त, बैठे दिन भरते हैं। दायम दरबार तेरे, गैर महल डरते हैं ॥ 1 ॥ तन शहीद मन शहीद, रात दिवस लड़ते हैं। ज्ञान तेरा ध्यान तेरा, इश्क आग जलते हैं ॥ 2 ॥ जान तेरा जिन्द तेरा, पाँवों सिर धरते हैं। दादू दीवान तेरा, जर खरीद घर के हैं ॥ 3 ॥ 423. गज ताल मुख बोल स्वामी तूँ अन्तर्यामी, तेरा शब्द सुहावै राम जी ॥ टेक ॥ धेनु चरावन बेनु बजावन, दर्श दिखावन कामिनी ॥ 1 ॥ विरह उपावन तम बुझावन, अंगि लगावन भामिनी ॥ 2 ॥ संग खिलावन रास बनावन, गोपी भावन भूधरा ॥ 3 ॥ दादू तारन दुरित निवारण, संत सुधारण राम जी ॥ 4 ॥ 424. केवल विनती। गज ताल हाथ दे हो रामा, तुम सब पूरण कामा, हौं तो उरझ रह्यो संसार ॥ टेक ॥ अंध कूप गृह में पर्यो, मेरी करहु सँभाल। तुम बिन दूजा को नहीं, मेरे दीनानाथ दयाल ॥ 1 ॥ मारग को सूझै नहीं, दह दिशि माया जाल। काल पाश कसि बाँधियो, मेरे कोई न छुड़ावनहार ॥ 2 ॥

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 राम बिना छूटै नहीं, कीजै बहुत उपाइ । कोटि किया सुलझै नहीं, अधिक अलूझत जाइ ॥ ३ ॥ दीन दुखी तुम देखताँ, भौ दुख भंजन राम । दादू कहै कर हाथ दे हो, तुम सब पूरण काम ॥ ४ ॥ 425. करुणा विनती । त्रिताल जनि छाड़ै राम जनि छाड़ै, हमहिं विसार जनि छाड़ै । जीव जात न लागै बार, जनि छाड़ै ॥ टेक ॥ माता क्यों बालक तजै, सुत अपराधी होइ । कबहुँ न छाड़े जीव तैं, जनि दुःख पावै सोइ ॥ १ ॥ ठाकुर दीनदयाल है, सेवक सदा अचेत । गुण औगुण हरि ना गिणै, अंतर तासौं हेत ॥ २ ॥ अपराधी सुत सेवका, तुम हो दीन दयाल । हमतैं औगुण होत हैं, तुम पूरण प्रतिपाल ॥ ३ ॥ जब मोहन प्राणहि चलै, तब देही किहि काम । तुम जानत दादू का कहै, अब जनि छाड़ै राम ॥ ४ ॥ 426. चौताल विषम बार हरि अधार, करुणा बहु नामी । भक्ति भाव बेग आइ, भीड़ भंजन स्वामी ॥ टेक ॥ अंत अधार संत सुधार, सुन्दर सुखदाई । काम क्रोध काल ग्रसत,प्रकटो हरि आई ॥ १ ॥ पूरण प्रतिपाल कहिये, सुमिऱ्यां तैं आवै । भरम कर्म मोह लागे, काहे न छुड़ावै ॥ २ ॥ दीनदयालु होहु कृपालु, अंतरयामी कहिये । एक जीव अनेक लागे, कैसे दुख सहिये ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 पावन पीव चरण शरण,युग युग तैं तारे । अनाथ नाथ दादू के, हरि जी हमारे ॥ 4 ॥ 427. विनती त्रिताल साजनियां ! नेह न तोरी रे, जे हम तोरैं महा अपराधी, तो तूँ जोरी रे ॥ टेक ॥ प्रेम बिना रस फीका लागै, मीठा मधुर न होई । सकल शिरोमणि सब तैं नीका, कड़वा लागै सोई ॥ 1 ॥ जब लग प्रीति प्रेम रस नाँहीं, तृषा बिना जल ऐसा । सब तैं सुन्दर एक अमीरस, होइ हलाहल जैसा ॥ 2 ॥ सुन्दरि सांई खरा पियारा, नेह नवा नित होवै । दादू मेरा तब मन मानै, सेज सदा सुख सोवै ॥ 3 ॥ 428. कर्ता कीर्ति । त्रिताल काइमां कीर्ति करूंली रे, तूँ मोटो दातार । सब तैं सिरजीला साहिबजी, तूँ मोटो कर्तार ॥ टेक ॥ चौदह भुवन भानै घड़ै, घड़त न लागै बार । थापै उथपै तूँ धणी, धनि धनि सिरजनहार ॥ 1 ॥ धरती अंबर तैं धन्या, पाणी पवन अपार । चंद सूर दीपक रचया, रैणि दिवस विस्तार ॥ 2 ॥ ब्रह्मा शंकर तैं किया, विष्णु दिया अवतार । सुर नर साधू सिरजिया, कर ले जीव विचार ॥ 3 ॥ आप निरंजन ह्वै रह्या, काइमां कौतिकहार । दादू निर्गुण गुण कहै, जाऊँली हौं बलिहार ॥ 4 ॥ 429. उपदेश चेतावनी । प्रति ताल जियरा! राम भजन कर लीजे ।

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