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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

तब तैं अंग और नहीं आवै, देखत हूँ सुखदाई ॥ टेक ॥ ता दिन तैं तन ताप न व्यापै, सुख दुख संग न जाऊँ । पावन पीव परस पद लीन्हा, आनंद भर गुन गाऊँ ॥ 1 ॥ सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं । एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥ 2 ॥ तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा । सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥ 3 ॥ 345. सच निदान । राज मृगांक ताल हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे । जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥ धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे । रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ 1 ॥ पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे । कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ 2 ॥ सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे । नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ 3 ॥ अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे । दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ 4 ॥ 346. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥ देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै । सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ 1 ॥ केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखें खबर न पावैं । तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ 2 ॥

श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा । यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥ सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई । तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ 4 ॥ 347. साधु परीक्षा । दादरा सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै । राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक॥ मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं । औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद माहीं ॥ 1 ॥ निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै । सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ 2 ॥ आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा । सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ 3 ॥ निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई । दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ 4 ॥ 348. परिचय परीक्षा । पतिताल राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै । जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥ टेक ॥ सुख दुख कबहूँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै । क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥ 1 ॥ जागत है सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै । अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥ 2 ॥ काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै । दादू सो सब की लहै, अरु कबहूं न हारै ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ३४९. समता ज्ञान । त्रिताल इन बातनि मेरा मन मानै । दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥ पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै । होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ 1 ॥ आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै । दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ 2 ॥ ३५०. परिचय । एक ताल ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं । पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥ देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं । अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ 1 ॥ तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं । अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ 2 ॥ प्राणपति तहँ पाइया, जहाँ उलट समाई । दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ 3 ॥ ३५१. त्रिताल आज प्रभात मिले हरि लाल । दिल की व्यथा पीड़ सब भागी, मिट्यो जीव को साल ॥ टेक ॥ देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥ 1 ॥ दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥ 2 ॥ ३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥ टेक ॥ नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे । जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥ 1 ॥ इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे । तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥ 2 ॥ सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे । दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥ 3 ॥ 353. (पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे । काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥ टेक ॥ महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे । स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्माराम वे ॥ 1 ॥ अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे । अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥ 2 ॥ सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे । दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥ 3 ॥ इति राग बिलावल सम्पूर्णः ॥ 21 ॥ पद 20 ॥ दादूराम सत्यराम

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राग सूहा अथ राग सूहा २२ (गायन समय दिन 9 से 12) 354. विनती । एक ताल तुम बिच अंतर जनि परै, माधव ! भावै तन धन लेहु । भावै स्वर्ग नरक रसातल, भावै करवत देहु ॥ टेक ॥ भावै विपति देहु दुख संकट, भावै संपति सुख शरीर । भावै घर वन राव रंक कर, भावै सागर तीर, माधव ॥ 1 ॥ भावै बँध मुक्त कर, माधव ! भावै त्रिभुवन सार । भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार, माधव ॥ 2 ॥ भावै धरणि गगन धर, माधव ! भावै शीतल सूर । दादू निकटि सदा संग, माधव ! तूँ जनि होवै दूर, माधव ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग सूहा 22 ३55. परिचय । पंजाबी त्रिताल अब हम राम सनेही पाया, अगम अनहद सौं चित लाया ॥ टेक ॥ तन मन आतम ताकों दीन्हा, तब हरि हम अपना कर लीन्हा। वाणी विमल पाँच परानां, पहिली शीश मिले भगवानां ॥ 1 ॥ जीवत जन्म सुफल कर लीन्हा, पहली चेते तिन भल कीन्हा। अवसर आपा ठौर लगावा, दादू जीवित ले पहुँचावा ॥ 2 ॥ इति राग सूहा सम्पूर्णः ॥ 22 ॥ पद 2 ॥ दादूराम सत्यराम

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कायाबेली ग्रंथ www.dadooram.org अथ काया बेली ग्रन्थ २३ ३५६. पिंड ब्रह्माण्ड शोधन । पंजाबी त्रिताल साचा सतगुरु राम मिलावे, सब कुछ काया मांहि दिखावे ॥ टेक ॥ काया माँही सिरजनहार, काया माँही ओंकार। काया माँही है आकाश, काया माँही धरती पास ॥ १ ॥ काया माँही पवन प्रकाश, काया माँही नीर निवास । काया माँही शशिहर सूर, काया माँही बाजे तूर ॥ २ ॥ काया माँही तीनों देव, काया माँही अलख अभेव । काया माँही चारों वेद, काया माँही पाया भेद ॥ ३ ॥ काया माँही चारों खानी, काया माँही चारों वाणी । काया माँही उपजै आइ, काया माँही मर मर जाइ ॥ ४ ॥ काया माँही जामै मरै, काया माँही चौरासी फिरै । काया माँही ले अवतार, काया माँही बारम्बार ॥ ५ ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही रात दिन, उदय अस्त इकतार। दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार ॥ 6 ॥ 357. त्रिताल काया माँही खेल पसारा, काया माँही प्राण अधारा। काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ॥ 1 ॥ काया माँही सब वन राइ, काया माँही रहे घर छाइ। काया माँही कंदलि वास, काया माँही है कैलास ॥ 2 ॥ काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया। काया माँही आदि अनंत, काया माँही है भगवन्त ॥ 3 ॥ काया माँही त्रिभुवन राइ, काया माँही रहे समाइ। काया माँही चौदह भुवन, काया माँही आवागवन ॥ 4 ॥ काया माँही सब ब्रह्मांड, काया माँही हैं नव खण्ड। काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ॥ 5 ॥ काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाइ। मनसा वाचा कर्मणा, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥ 6 ॥ 358.रंगताल काया माँही सागर सात, काया माँही अविगत नाथ। काया माँही नदिया नीर, काया माँही गहर गंभीर ॥ 1 ॥ काया माँही सरवर पाणी, काया माँही बसै बिनाणी। काया माँही नीर निवान, काया माँही हंस सुजान ॥ 2 ॥ काया माँही गंग तरंग, काया माँही जमुना संग। काया माँही है सरस्वती, काया माँही द्वारावती ॥ 3 ॥ काया माँही काशी स्थान, काया माँही करै स्नान। काया माँही पूजा पाती, काया माँही तीर्थ जाती ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23

काया माँही मुनिवर मेला, काया माँही आप अकेला । काया माँही जपिये जाप, काया माँही आपै आप ॥ 5 ॥ काया नगर निधान है, माँही कौतिक होइ । दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ ॥ 6 ॥

  1. रंगताल काया माँही विषमी बाट, काया माँही औघट घाट। काया माँही पट्टण गाँव, काया माँही उत्तम ठाँव ॥ 1 ॥ काया माँही मण्डप छाजै, काया माँही आप विराजै। काया माँही महल आवास, काया माँही निश्चल बास ॥ 2 ॥ काया माँही राजद्वार, काया माँही बोलणहार। काया माँही भरे भण्डार, काया माँही वस्तु अपार ॥ 3 ॥ काया माँही नौ निधि होइ, काया माँही अठ सिधि सोइ। काया माँही हीरा साल, काया माँही निपजैं लाल ॥ 4 ॥ काया माँही माणिक भरे, काया माँही ले ले धरे। काया माँही रत्न अमोल, काया माँही मोल न तोल ॥ 5 ॥ काया माँही कर्तार है, सो निधि जानै नाँहि। दादू गुरुमुख पाइये, सब कुछ काया मांहि ॥ 6 ॥

  2. वर्णभिन्न ताल काया माँही सब कुछ जाण, काया मांहै लेहु पिछाण। काया माँही बहु विस्तार, काया माँही अनन्त अपार ॥ 1 ॥ काया माँही अगम अगाध, काया माँही निपजे साध। काया माँही कह्या न जाइ, काया माँही रहे ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥ काया माँही साधन सार, काया माँही करे विचार। काया माँही अमृत वाणी, काया माँही सारंग प्राणी ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही खेलै प्राण, काया माँही पद निर्वाण। काया माँही मूल गह रहै, काया मांही सब कुछ लहै ॥ 4 ॥ काया माँही निज निरधार, काया माँही अपरम्पार। काया माँही सेवा करै, काया माँही नीझर झरै ॥ 5 ॥ काया माँही वास कर, रहै निरंतर छाइ। दादू पाया आदि घर, सद्गुरु दिया दिखाइ ॥ 6 ॥ 361. वर्ण भिन्न ताल काया माँही अनुभै सार, काया माँही करै विचार। काया माँही उपजै ज्ञान, काया माँही लागै ध्यान ॥ 1 ॥ काया माँही अमर स्थान, काया माँही आतमराम। काया माँही कला अनेक, काया माँही कर्ता एक॥ 2 ॥ काया माँही लागै रंग, काया माँही सांई संग। काया माँही सरवर तीर, काया माँही कोकिल कीर ॥ 3 ॥ काया माँही कच्छप नैन, काया माँही कूँजी बैन। काया माँही कमल प्रकाश, काया माँही मधुकर वास ॥ 4 ॥ काया माँही नाद कुरंग, काया माँही ज्योति पतंग। काया माँही चातक मोर, काया माँही चंद चकोर ॥ 5 ॥ काया माँही प्रीति कर, काया माँही सनेह। काया माँही प्रेम रस, दादू गुरुमुख येह ॥ 6 ॥ 362. राज विद्याधर ताल काया माँही तारणहार, काया माँही उतरे पार। काया माँही दुस्तर तारे, काया माँही आप उबारे ॥ 1 ॥ काया माँही दुस्तर तिरे, काया माँही होइ उद्धरे। काया माँही निपजै आइ, काया माँही रहै समाइ ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही खुले कपाट, काया माँही निरंजन हाट। काया माँही है दीदार, काया माँही देखणहार ॥ 3 ॥ काया माँही राम रंग राते, काया माँही प्रेम रस माते। काया माँही अविचल भये, काया माँही निहचल रहे ॥ 4 ॥ काया माँही जीवै जीव, काया माँही पाया पीव। काया माँही सदा आनंद, काया माँही परमानन्द ॥ 5 ॥ काया माँही कुशल है, सो हम देख्या आइ। दादू गुरुमुख पाइये, साधु कहैं समझाइ ॥ 6 ॥ 363. राज विद्याधर ताल काया माँही देख्या नूर, काया माँही रह्या भरपूर। काया माँही पाया तेज, काया माँही सुन्दर सेज ॥ 1 ॥ काया माँही पुंज प्रकाश, काया माँही सदा उजास। काया माँही झिलमिल सारा, काया माँही सब तैं न्यारा ॥ 2 ॥ काया माँही ज्योति अनन्त, काया माँही सदा बसन्त। काया माँही खेलें फाग, काया माँही सब वन बाग ॥ 3 ॥ काया माँही खेलें रास, काया माँही विविध विलास। काया माँही बाजैं बाजे, काया माँही नाद धुनि साजे ॥ 4 ॥ काया माँही सेज सुहाग, काया माँही मोटे भाग। काया माँही मंगलाचार, काया माँही जै जैकार ॥ 5 ॥ काया अगम अगाध है, माँही तूर बजाइ। दादू प्रकट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ ॥ 6 ॥ इति कायाबेली ग्रन्थ सम्पूर्णः ॥ 23 ॥ पद 10 ॥

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राग बसंत www.dadooram.org अथ राग बसंत २४ (गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा बसंत ऋतु) ३६४. भजन भेद । मल्लिका मोद ताल निर्मल ना मन लीयो जाइ, जाके भाग बड़े सोई फल खाइ ॥ टेक ॥ मन माया मोह मद माते, कर्म कठिन ता मांहि परे । विषय विकार मान मन मांही, सकल मनोरथ स्वाद खरे ॥ १ ॥ काम क्रोध ये काल कल्पना, मैं मैं मेरी अति अहंकार । तृष्णा तृप्ति न मानै कबहूँ, सदा कुसंगी पाँच विकार ॥ २ ॥ अनेक जोध रहैं रखवाले, दुर्लभ दूर फल अगम अपार । जाके भाग बड़े सोई फल पावै, दादू दाता सिरजनहार ॥ ३ ॥ ३६५. (गुजराती) विरह । धीमी ताल

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 तूँ घर आवने माहरे रे, हूँ जाऊँ वारणे ताहरे रे ॥ टेक ॥ रैन दिवस मूनै निरखतां जाये । वेलो थई घर आवे रे, वाहला आकुल थाये ॥ 1 ॥ तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ । एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥ 2 ॥ ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला । दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥ 3 ॥ 366. करूणा विनती । तेवरा ताल मोहन दुख दीरघ तूँ निवार, मोहि सतावै बारम्बार ॥ टेक ॥ काम कठिन घट रहै मांहि, तातैं ज्ञान ध्यान दोउ उदै नांहि । गति मति मोहन विकल मोर, तातैं चित्त न आवै नाम तोर ॥ 1 ॥ पाँचों द्वन्दर देह पूरि, तातैं सहज शील सत रहैं दूरि । सुधि बुधि मेरी गई भाज, तातैं तुम विसरे महाराज ॥ 2 ॥ क्रोध न कबहुँ तजै संग, तातैं भाव भजन का होइ भंग । समझि न काई मन मंझारि, तातैं चरण विमुख भये श्री मुरारि ॥ 3 ॥ अन्तरजामी कर सहाइ, तेरो दीन दुखित भयो जन्म जाइ । त्राहि त्राहि प्रभु तूँ दयाल, कहै दादू हरि कर संभाल ॥ 4 ॥ 367. मन स्थिरार्थ विनती । एक ताल मेरे मोहन मूरति राखि मोहि, निसवासर गुण रमूं तोहि ॥ टेक ॥ मन मीन होइ ज्यों स्वाद खाइ, लालच लागो जल तैं जाइ । मन हस्ती मातो अपार, काम अंध गज लहै न सार ॥ 1 ॥ मन पतंग पावक परै, अग्नि न देखै ज्यों जरै । मन मृगा ज्यों सुनै नाद, प्राण तजै यूं जाइ बाद ॥ 2 ॥ मन मधुकर जैसे लुब्धि वास, कँवल बँधावै होइ नास ।

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 मनसा वाचा शरण तोर, दादू को राखो गोविन्द मोर ॥ ३ ॥ ३६८. उपदेश । एक ताल बहुरि न कीजे कपट कांम, हिरदै जपिये राम नांम ॥ टेक॥ हरि पाखैं नहिं कहूँ ठांम, पीव बिन खड़भड़ गांम गांम । तुम राखो जियरा अपनी मांम, अनत जनि जाय रहो विश्रांम ॥ १ ॥ कपट कांम नहीं कीजे हाँम, रघु चरण कमल कहु राम नांम । जब अंतरयामी रहै जांम, तब अक्षय पद जन दादू प्रांम ॥ २ ॥ ३६९. परिचय प्राप्ति । कड्डुक ताल तहँ खेलूं पीव सूं नित ही फाग, देख सखी री मेरे भाग ॥ टेक ॥ तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ, प्रेम पिलावै आप सोइ । संगियन सेती रमूं रास, तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥ १ ॥ तहँ वचन अमोलक सब ही सार, तहँ बरतै लीला अति अपार । उमंग देइ तब मेरे भाग, तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥ २ ॥ अलख देव कोइ जाणैं भेव, तहँ अलख देव की कीजै सेव । दादू बलि बलि बारंबार, तहँ आप निरंजन निराधार ॥ ३ ॥ ३७०. परिचय सुख वर्णन । षड़ताल मोहन माली सहज समाना, कोई जाणैं साध सुजाना ॥ टेक ॥ काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया । सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥ बाहर भीतर सर्व निरंतर, सब में रह्या समाई । परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥ २ ॥ ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै । अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24 371. परिचय । षड़ताल मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥ तहँ पायो देव निरंजना, परगट भयो हरि यह तना । नैनन ही देखूं अघाइ, प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ 1 ॥ मोहि कर नैनन की सैन देइ, प्राण मूंखि हरि मोर लेइ । तब उपजै मोकौं इहै बानि, निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ 2 ॥ अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, बैन बाण तातें लागे मोहि । शरणै दादू रह्यो जाइ, हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ 3 ॥ 372. थकित निश्चल । मदन ताल मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥ टेक ॥ हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन । उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥ 1 ॥ सहज समाधि तज विकार, अविनाशी रस पीवहिं सार । थकित भये मिल महल मांहिं, मनसा वाचा आन नांहिं ॥ 2 ॥ मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग । सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥ 3 ॥ इति राग बसंत सम्पूर्णः ॥ 24 ॥ पद 9 ॥

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राग भैरूं www.dadooram.org अथ राग भैरूं 25 (गायन समय प्रातः काल) 373. सतगुरु तथा नाम महिमा । त्रिताल सतगुरु चरणां मस्तक धरणां, राम नाम कहि दुस्तर तिरणां ॥ टेक ॥ अठ सिधि नव निधि सहजैं पावै, अमर अभै पद सुख में आवै ॥ 1 ॥ भक्ति मुक्ति बैकुंठा जाइ, अमर लोक फल लेवै आइ ॥ 2 ॥ परम पदारथ मंगल चार, साहिब के सब भरे भंडार ॥ 3 ॥ नूर तेज है ज्योति अपार, दादू राता सिरजनहार ॥ 4 ॥ 374. उत्तम ज्ञान स्मरण । चौताल तन ही राम मन ही राम, राम हृदय रमि राखि ले । मनसा राम सकल परिपूरण, सहज सदा रस चाखि ले ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25

नैनां राम बैनां राम, रसनां राम सँभारि ले । श्रवणां राम सन्मुख राम, रमता राम विचारि ले ॥ 1 ॥ श्वासैं राम सुरतैं राम, शब्दैं राम समाइ ले । अंतर राम निरंतर राम, आत्मराम ध्याइ ले ॥ 2 ॥ सर्वैं राम संगैं राम, राम नाम ल्यौ लाइ ले । बाहर राम भीतर राम, दादू गोविन्द गाइ ले ॥ 3 ॥

  1. उत्तम स्मरण। मदन ताल ऐसी सुरति राम ल्यौ लाइ, हरि हृदय जनि बिसरि जाइ ॥ टेक ॥ छिन छिन मात संभारै पूत, बिंद राखै जोगी अवधूत । त्रिया कुरूप रूप कों रटै, नटणी निरख बांस बरत चढ़ै ॥ 1 ॥ कच्छप दृष्टि धरै धियांन, चातक नीर प्रेम की बान । कुंजी कुरलि संभालै सोइ, भृंगी ध्यान कीट को होइ ॥ 2 ॥ श्रवणों शब्द ज्यूं सुनै कुरंग, ज्योति पतंग न मोड़ै अंग । जल बिन मीन तलफि ज्यों मरै, दादू सेवक ऐसै करै ॥ 3 ॥

  2. स्मरण फल। एक ताल निर्गुण राम रहै ल्यौ लाइ, सहजैं सहज मिलै हरि जाइ ॥ टेक ॥ भौजल व्याधि लिपै नही कबहूँ, करम न कोई लागै आइ । तीनों ताप जरै नहिं जियरा, सो पद परसै सहज सुभाइ ॥ 1 ॥ जन्म जरा जोनी नहिं आवै, माया मोह न लागै ताहि । पाँचों पीड़ प्राण नहीं व्यापै, सकल सोधि सब इहै उपाइ ॥ 2 ॥ संकट संशय नरक न नैनहूँ, ताको कबहूँ काल न खाइ । कंप न काई भय भ्रम भागै, सब विधि ऐसी एक लगाइ ॥ 3 ॥ सहज समाधि गहो जे दिढ़ करि, जासौँ लागै सोइ आइ । भृंगी होइ कीट की न्यांई, हरि जन दादू एक दिखाइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 377. आशीर्वाद । पड़ताल धन्य धन्य तूँ धन्य धणी, तुम्ह सौं मेरी आइ बणी ॥ टेक ॥ धन्य धन्य तूँ तारे जगदीश, सुर नर मुनिजन सेवैं ईश। धन्य धन्य तूँ केवल राम, शेष सहस्र मुख ले हरि नाम ॥ 1 ॥ धन्य धन्य तूँ सिरजनहार, तेरा कोई न पावै पार। धन्य धन्य तूँ निरंजन देव, दादू तेरा लखै न भेव ॥ 2 ॥ 378. भयभीत भयानक । दादरा का जानों मोहि का ले करसी ? तनहिं ताप मोहि छिन न विसरसी ॥ टेक ॥ आगम मोपै जान्यूं न जाहि, इहै विमासण जियरे मांहि ॥ 1 ॥ मैं नहिं जानों क्या सिर होइ, तातैं जियरा डरपै रोइ ॥ 2 ॥ काहू तैं ले कछू करै, तातैं मइया जीव डरै ॥ 3 ॥ दादू न जानें कैसे कहै, तुम शरणागति आइ रहै ॥ 4 ॥ 379. क्रीड़ा तालश्वण्डनि का जानों राम ! को गति मेरी ? मैं विषयी मनसा नहीं फेरी ॥ टेक ॥ जे मन मांगै सोई दीन्हा, जाता देख फेरि नहिं लीन्हा ॥ 1 ॥ देवा द्वन्द्वर अधिक पसारे, पाँचों पकर पटक नहिं मारे ॥ 2 ॥ इन बातन घट भरे विकारा, तृष्णा तेज मोह नहिं हारा ॥ 3 ॥ इनहिं लाग मैं सेव न जानी, कहै दादू सुन कर्म कहानी ॥ 4 ॥ 380. क्रीड़ा तालश्वण्डनि डरिये रे डरिये, तातैं राम नाम चित धरिये ॥ टेक ॥ जिन ये पँच पसारे रे, मारे रे ते मारे रे ॥ 1 ॥ जिन ये पँच समेटे रे, भेटे रे ते भेटे रे ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 कच्छप ज्यों कर लीये रे, जीये रे ते जीये रे ॥ ३ ॥ भृंगी कीट समाना रे, ध्याना रे यहु ध्याना रे ॥ 4 ॥ अजा सिंह ज्यों रहिये रे, दादू दर्शन लहिये रे ॥ 5 ॥ ३४1. हरि प्राप्ति दुर्लभ । त्रिताल तहँ मुझ कमीन की कौन चलावै, जाको अजहुँ मुनिजन महल न पावै ॥ टेक ॥ शिव विरंचि नारद यश गावैं, कौन भांति कर निकट बुलावैं ॥ 1 ॥ देवा सकल तेतीसौँ क्रोरि, रहे दरबार ठाड़े कर जोरि ॥ 2 ॥ सिध साधक रहे लयौ लाइ, अजहूँ मोटे महल न पाइ ॥ 3 ॥ सब तैं नीच मैं नाम न जाना, कहै दादू क्यों मिलै सयाना ॥ 4 ॥ ३४२. करूणा विनती । त्रिताल तुम बिन कहु क्यों जीवन मेरा, अजहूँ न देख्या दर्शन तेरा ॥ टेक ॥ होहु दयाल दीन के दाता, तुम पति पूरण सब विधि साचा ॥ 1 ॥ जो तुम करो सोई तुम छाजे, अपने जन को काहे न निवाजे ॥ 2 ॥ अकरन करन ऐसैं अब कीजे, अपनो जान कर दर्शन दीजे ॥ 3 ॥ दादू कहै सुनहु हरि सांई, दर्शन दीजे मिलो गुसांई ॥ 4 ॥ ३४३. उपदेश चेतावनी । पंजाबी त्रिताल कागा रे करंक पर बोलै, खाइ माँस अरु लग ही डोलै ॥ टेक ॥ जा तन को रचि अधिक सँवारा, तो तन ले माटी में डारा ॥ 1 ॥ जा तन देख अधिक नर फूले, सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥ 2 ॥ जा तन देख मन में गर्वाना, मिल गया माटी तज अभिमाना ॥ 3 ॥ दादू तन की कहा बड़ाई, निमष माँहि माटी मिल जाई ॥ 4 ॥

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५. आरती, नामावली एवं परिशिष्ट

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 ३८४. उपदेश । त्रिताल जप गोविन्द, विसर जनि जाइ, जनम सुफल करिये लै लाइ ॥ टेक ॥ हरि सुमिरण सौं हेत लगाइ, भजन प्रेम यश गोविन्द गाइ । मानुष देह मुक्ति का द्वारा, राम सुमिर जग सिरजनहारा ॥ 1 ॥ जब लग विषम व्याधि नहिं आई, जब लग काल काया नहिं खाई । जब लग शब्द पलट नहीं जाई, तब लग सेवा कर राम राई ॥ 2 ॥ अवसर राम कहसि नहीं लोई, जनम गया तब कहै न कोई । जब लग जीवै तब लग सोई, पीछे फिर पछतावा होई ॥ 3 ॥ सांई सेवा सेवक लागे, सोई पावे जे कोइ जागे । गुरुमुख भरम तिमर सब भागे, बहुरि न उलटे मारग लागे ॥ 4 ॥ ऐसा अवसर बहुरि न तेरा, देख विचार समझ जिय मेरा । दादू हार जीत जग आया, बहुत भांति कह-कह समझाया ॥ 5 ॥ ३८५. प्रतिताल राम नाम तत काहे न बोलै, रे मन मूढ़ अनत जनि डोलै ॥ टेक ॥ भूला भरमत जन्म गमावै, यहु रस रसना काहै न गावै ॥ 1 ॥ क्या झक औरै परत जंजाले, वाणी विमल हरि काहे न सँभालै ॥ 2 ॥ राम विसार जन्म जनि खोवै, जपले जीवन साफल होवै ॥ 3 ॥ सार सुधा सदा रस पीजे, दादू तन धर लाहा लीजे ॥ 4 ॥ ३८६. तत्व उपदेश । प्रतिताल आप आपण में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥ ज्यों मही बिलोये माखण आवै, त्यों मन मथियां तैं तत पावै ॥ 1 ॥ काष्ठ हुताशन रह्या समाई, त्यूं मन माँही निरंजन राई ॥ 2 ॥ ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माँही साच सयाना ॥ 3 ॥ ज्यों दर्पण के नहिं लागै काई, त्यों मूरति माँही निरख लखाई ॥ 4 ॥

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