सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 दादू आसिक रब्ब दा, सिर भी डेवै लाहि । अल्लह कारण आपको, साड़े अंदर भाहि ॥ 59 ॥ भोरे भोरे तन करै, वंडे करि कुरवाण । मिट्ठा कौड़ा ना लगै, दादू तो हूं साण ॥ 60 ॥ विरही विरह लक्षण जब लग सीस न सौंपिये, जब लग इश्क न होइ । आशिक मरणैं ना डरै, पिया पियाला सोइ ॥ 61 ॥ विरह पतिव्रत तैं डीनोंई सभु, जे डीये दीदार के। उंजे लहदी अभु, पसाई दो पाण के॥ 62 ॥ बिचौं सभो दूरि कर, अंदर बिया न पाइ । दादू रत्ता हिकदा, मन मोहब्बत लाइ ॥ 63 ॥ विरह उपदेश दादू इश्क मोहब्बत मस्त मन, तालिब दर दीदार । दोस्त दिल हरदम हजूर, यादगार हुसियार ॥ 64 ॥ विरह लक्षण आशिक एक अल्लाह के, फारिक दुनियां दीन । तारिक इस औजूद थें, दादू पाक यकीन ॥ 65 ॥ विरह जिज्ञासु उपदेश आसिकां रह कब्ज कर्दा, दिल वजां रफतांद । अल्लह आले नूर दीदम, दिल ही दादू बंद ॥ 66 ॥ दादू इश्क आवाज सौं, ऐसे कहै न कोइ । दर्द मोहब्बत पाइये, साहिब हासिल होइ ॥ 67 ॥ विरह विलाप कहँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ । कहँ आलम औजूद सौं, कहै जबां की बात ॥ 68 ॥
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