भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 दादू इश्क अल्लाह का, जे कबहुँ प्रकटै आइ । तो तन मन दिल अरवाह का, सब पड़दा जल जाइ ॥ 69 ॥ विरह जिज्ञासु उपदेश अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चे कार । दादू नूर दादनी, आशिकां दीदार ॥ 70 ॥ विरह ज्ञान अग्नि विरह अग्नि तन जालिये, ज्ञान अग्नि दौं लाइ । दादू नखशिख परजलै, तब राम बुझावै आइ ॥ 71 ॥ विरह अग्नि में जालिबा, दरशन के तांईं । दादू आतुर रोइबा, दूजा कुछ नांहिं ॥ 72 ॥ विरह पतिव्रत साहिब सौं कुछ बल नहीं, जनि हठ साधै कोइ । दादू पीड़ पुकारिये, रोतां होइ सो होइ ॥ 73 ॥ ज्ञान ध्यान सब छाड़ दे, जप तप साधन जोग । दादू विरहा ले रहै, छाड़ सकल रस भोग ॥ 74 ॥ जहाँ विरहा तहँ और क्या, सुधि, बुधि नाठे ज्ञान । लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 75 ॥ विरही विरह लक्षण विरही जन जीवै नहीं, जे कोटि कहैं समझाइ । दादू गहिला ह्वै रहै, तलफि तलफि मर जाइ ॥ 76 ॥ दादू तलफै पीड़ सौं, बिरही जन तेरा । ससकै सांई कारणै, मिलि साहिब मेरा ॥ 77 ॥ पड़या पुकारै पीड़ सौं, दादू बिरही जन । राम सनेही चित बसै, और न भावै मन ॥ 78 ॥ जिस घट विरहा राम का, उस नींद न आवै । दादू तलफै विरहनी, उसे पीड़ जगावै ॥ 79 ॥

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