भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 विरह विलाप रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नाहिं । रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥ 136 ॥ दादू नैन हमारे बावरे, रोवें नहीं दिन रात । सांई संग न जागही, पीव क्यों पूछे बात ॥ 137 ॥ नैनहुँ नीर न आइया, क्या जाणैं ये रोइ । तैसें ही करि रोइये, साहिब नैनहूँ जोइ ॥ 138 ॥ दादू नैन हमारे ढीठ हैं, नाले नीर न जांहि । सूके सरां सहेत वै, करंक भये गलि मांहि ॥ 139 ॥ विरही विरह लक्षण दादू विरह प्रेम की लहर में यह मन पंगुल होइ । राम नाम में गलि गया, बूझे बिरला कोइ ॥ 140 ॥ विरह ज्ञान अग्नि दादू विरह अग्नि में जल गये, मन के मैल विकार । दादू विरही पीव का, देखेगा दीदार ॥ 141 ॥ विरह अग्नि में जल गये, मन के विषय विकार । ताथैं पंगुल ह्वै रह्या, दादू दर दीदार ॥ 142 ॥ जब विरहा आया दर्द सौं, तब मीठा लगा राम । काया लागी काल ह्वै, कड़वे लागे काम ॥ 143 ॥ जब राम अकेला रह गया, तन मन गया बिलाइ । दादू विरही तब सुखी, जब दर्श पर्श मिल जाइ ॥ 144 ॥ जे हम छाड़ै राम को, तो राम न छाड़ै । दादू अमली अमल तैं, मन क्यों करि काढै ॥ 145 ॥ विरह प्रतिबिम्ब विरहा पारस जब मिला, तब विरहनी विरहा होइ । दादू परसै विरहनी, पीव पीव टेरे सोइ ॥ 146 ॥

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