सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 आशिक माशूक ह्वै गया, इश्क कहावै सोइ । दादू उस माशूक का, अल्लाह आशिक होइ ॥ 147 ॥ राम विरहनी ह्वै रह्या, विरहनी ह्वै गई राम। दादू विरहा बापुरा, ऐसे कर गया काम ॥ 148 ॥ विरह बिचारा ले गया, दादू हमको आइ । जहां अगम अगोचर राम था, तहँ विरह बिना को जाइ ॥ 149 ॥ विरह बापुरा आइ कर, सोवत जगावे जीव। दादू अंग लगाइ कर, ले पहुँचावे पीव ॥ 150 ॥ विरहा मेरा मीत है, विरहा बैरी नांहि। विरहा को बैरी कहै, सो दादू किस मांहि ॥ 151 ॥ दादू इश्क अलह की जाति है, इश्क अलह का अंग । इश्क अलह वजूदहै, इश्क अलह का रंग ॥ 152 ॥ साध महिमा महात्म दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव । तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥ 153 ॥ विरह पतिव्रत बाट विरही की सोधि करि, पंथ प्रेम का लेहु । लै के मारग जाइये, दूसर पांव न देहु ॥ 154 ॥ बिरही बेगा भक्ति सहज में, आगे पीछे जाइ । थोड़े माहीं बहुत है, दादू रहू लयौ लाइ ॥ 155 ॥ बिरहा बेगा ले मिलै, तालाबैली पीर । दादू मन घाइल भया, सालै सकल सरीर ॥ 156 ॥ विरह विनती आज्ञा अपरंपार की, बसि अंबर भरतार । हरे पटंबर पहरि करि, धरती करै सिंगार ॥ 157 ॥
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