भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2

दादू विरह जगावे दर्द को, दर्द जगावे जीव। जीव जगावे सुरति को, पंच पुकारैं पीव ॥ 126 ॥ सहजैं मनसा मन सधै, सहजैं पवना सोइ। सहजैं पंचों थिर भये, जे चोट विरह की होइ ॥ 127 ॥ मारणहारा रहि गया, जिहिं लागी सो नांहि। कबहूँ सो दिन होइगा, यहु मेरे मन मांहि ॥ 128 ॥ प्रीतम मारे प्रेम सौं, तिन को क्या मारे। दादू जारे विरह के, तिन को क्या जारे ॥ 129 ॥ छिन बिछोह दादू पड़दा पलक का, येता अन्तर होइ। दादू विरही राम बिन, क्यों कर जीवै सोइ ॥ 130 ॥ विरह लक्षण काया मांहैं क्यों रह्या, बिन देखे दीदार। दादू बिरही बावरा, मरै नहीं तिहिं बार ॥ 131 ॥ विरह कसौटी बिन देखे जीवै नहीं, विरह का सहिनाण। दादू जीवै जब लगै, तब लग विरह न जाण ॥ 132 ॥ विरह बिनती रोम-रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार। राम घटा दल उमंग कर, बरसहु सिरजनहार ॥ 133 ॥ विरह लक्षण प्रीति जु मेरे पीव की, पैठी पिंजर मांहि। रोम-रोम पीव-पीव करै, दादू दूसर नांहि ॥ 134 ॥ सब घट श्रवणा सुरति सौं सब घट रसना बैन। सब घट नैनां है रहै, दादू विरहा ऐन ॥ 135 ॥

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