सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू विरह जगावे दर्द को, दर्द जगावे जीव। जीव जगावे सुरति को, पंच पुकारैं पीव ॥ 126 ॥ सहजैं मनसा मन सधै, सहजैं पवना सोइ। सहजैं पंचों थिर भये, जे चोट विरह की होइ ॥ 127 ॥ मारणहारा रहि गया, जिहिं लागी सो नांहि। कबहूँ सो दिन होइगा, यहु मेरे मन मांहि ॥ 128 ॥ प्रीतम मारे प्रेम सौं, तिन को क्या मारे। दादू जारे विरह के, तिन को क्या जारे ॥ 129 ॥ छिन बिछोह दादू पड़दा पलक का, येता अन्तर होइ। दादू विरही राम बिन, क्यों कर जीवै सोइ ॥ 130 ॥ विरह लक्षण काया मांहैं क्यों रह्या, बिन देखे दीदार। दादू बिरही बावरा, मरै नहीं तिहिं बार ॥ 131 ॥ विरह कसौटी बिन देखे जीवै नहीं, विरह का सहिनाण। दादू जीवै जब लगै, तब लग विरह न जाण ॥ 132 ॥ विरह बिनती रोम-रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार। राम घटा दल उमंग कर, बरसहु सिरजनहार ॥ 133 ॥ विरह लक्षण प्रीति जु मेरे पीव की, पैठी पिंजर मांहि। रोम-रोम पीव-पीव करै, दादू दूसर नांहि ॥ 134 ॥ सब घट श्रवणा सुरति सौं सब घट रसना बैन। सब घट नैनां है रहै, दादू विरहा ऐन ॥ 135 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 विरह विलाप रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नाहिं । रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥ 136 ॥ दादू नैन हमारे बावरे, रोवें नहीं दिन रात । सांई संग न जागही, पीव क्यों पूछे बात ॥ 137 ॥ नैनहुँ नीर न आइया, क्या जाणैं ये रोइ । तैसें ही करि रोइये, साहिब नैनहूँ जोइ ॥ 138 ॥ दादू नैन हमारे ढीठ हैं, नाले नीर न जांहि । सूके सरां सहेत वै, करंक भये गलि मांहि ॥ 139 ॥ विरही विरह लक्षण दादू विरह प्रेम की लहर में यह मन पंगुल होइ । राम नाम में गलि गया, बूझे बिरला कोइ ॥ 140 ॥ विरह ज्ञान अग्नि दादू विरह अग्नि में जल गये, मन के मैल विकार । दादू विरही पीव का, देखेगा दीदार ॥ 141 ॥ विरह अग्नि में जल गये, मन के विषय विकार । ताथैं पंगुल ह्वै रह्या, दादू दर दीदार ॥ 142 ॥ जब विरहा आया दर्द सौं, तब मीठा लगा राम । काया लागी काल ह्वै, कड़वे लागे काम ॥ 143 ॥ जब राम अकेला रह गया, तन मन गया बिलाइ । दादू विरही तब सुखी, जब दर्श पर्श मिल जाइ ॥ 144 ॥ जे हम छाड़ै राम को, तो राम न छाड़ै । दादू अमली अमल तैं, मन क्यों करि काढै ॥ 145 ॥ विरह प्रतिबिम्ब विरहा पारस जब मिला, तब विरहनी विरहा होइ । दादू परसै विरहनी, पीव पीव टेरे सोइ ॥ 146 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 आशिक माशूक ह्वै गया, इश्क कहावै सोइ । दादू उस माशूक का, अल्लाह आशिक होइ ॥ 147 ॥ राम विरहनी ह्वै रह्या, विरहनी ह्वै गई राम। दादू विरहा बापुरा, ऐसे कर गया काम ॥ 148 ॥ विरह बिचारा ले गया, दादू हमको आइ । जहां अगम अगोचर राम था, तहँ विरह बिना को जाइ ॥ 149 ॥ विरह बापुरा आइ कर, सोवत जगावे जीव। दादू अंग लगाइ कर, ले पहुँचावे पीव ॥ 150 ॥ विरहा मेरा मीत है, विरहा बैरी नांहि। विरहा को बैरी कहै, सो दादू किस मांहि ॥ 151 ॥ दादू इश्क अलह की जाति है, इश्क अलह का अंग । इश्क अलह वजूदहै, इश्क अलह का रंग ॥ 152 ॥ साध महिमा महात्म दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव । तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥ 153 ॥ विरह पतिव्रत बाट विरही की सोधि करि, पंथ प्रेम का लेहु । लै के मारग जाइये, दूसर पांव न देहु ॥ 154 ॥ बिरही बेगा भक्ति सहज में, आगे पीछे जाइ । थोड़े माहीं बहुत है, दादू रहू लयौ लाइ ॥ 155 ॥ बिरहा बेगा ले मिलै, तालाबैली पीर । दादू मन घाइल भया, सालै सकल सरीर ॥ 156 ॥ विरह विनती आज्ञा अपरंपार की, बसि अंबर भरतार । हरे पटंबर पहरि करि, धरती करै सिंगार ॥ 157 ॥
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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार । गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ।। 158 ।। काला मुँह कर काल का, सांई सदा सुकाल । मेघ तुम्हारे घर घणां, बरसहु दीनदयाल ।। 159 ।। इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तृतीयो विरह का अंग सम्पूर्ण ।। अंग 3 ।। साखी 159 ।। दादूराम राम सत्यराम
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परिचय का अंग www.dadooram.org अथ परिचय का अंग ४ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः। वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू निरंतर पीव पाइया, तहँ पंखी उनमनि जाइ। सप्तों मंडल भेदिया, अष्टैं रह्या समाइ ॥ 2 ॥ परमात्मा का स्वरूप दादू निरंतर पीव पाइया, तहँ निगम न पहुँचे वेद। तेज स्वरूपी पीव बसे, कोई बिरला जानैं भेद ॥ 3 ॥ परमेश्वर का निवास दादू निरंतर पीव पाइया, तीन लोक भरपूर। सब सेजों साँई बसै, लोक बतावैं दूर ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू निरंतर पीव पाइया, जहाँ आनन्द बारह मास। हंस सौं परम हंस खेलै, तहँ सेवक स्वामी पास ॥ 5 ॥ दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ बाजै बैन रसाल। अकल पाट पर बैठा स्वामी, प्रेम पिलावै लाल ॥ 6 ॥ दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, सेती दीनदयाल। निसवासर नहिं तहँ बसै, मानसरोवर पाल ॥ 7 ॥ दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ कबहुँ न होइ वियोग। आदि पुरुष अन्तर मिल्या, कुछ पूरबले संयोग ॥ 8 ॥ दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ बारह मास बसंत। सेवग सदा आनन्द है, जुग जुग देखूँ कंत ॥ 9 ॥ भगवत् प्राप्ति का स्थान दादू काया अन्तर पाइया, त्रिकुटी केरे तीर। सहजैं आप लखाइया, व्याप्या सकल सरीर ॥ 10 ॥ दादू काया अंतर पाइया, निरन्तर निरधार। सहजैं आप लखाइया, ऐसा समरथ सार ॥ 11 ॥ दादू काया अंतर पाइया, अनहद बैन बजाइ। सहजैं आप लखाइया, शून्य मंडल में जाइ ॥ 12 ॥ दादू काया अंतर पाइया, सब देवन का देव। सहजैं आप लखाइया, ऐसा अलख अभेव ॥ 13 ॥ सुख महिमा और फल दादू भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर रस पीव। तहँ हंसा मोती चुणै, पीव देखै सुख जीव ॥ 14 ॥ दादू भँवर कँवल रस बेधिया, गहे चरण कर हेत। पीवजी परसत ही भया, रोम रोम सब श्वेत ॥ 15 ॥ दादू भँवर कँवल रस बेधिया, अनत न भरमै जाइ। तहाँ बास बिलंबिया, मगन भया रस खाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू भँवर कँवल रस बेधिया, गही जो पीव की ओट। तहाँ दिल भँवरा रहै, कौण करै शिर चोट ॥ 17 ॥ परिचय जिज्ञासु उपदेश दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, सबद ऊपने पास। तहाँ एक एकांत है, जहाँ ज्योति प्रकास ॥ 18 ॥ दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहाँ चन्द न ऊगे सूर। निरंतर निर्धार है, तेज रह्या भरपूर ॥ 19 ॥ दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहाँ बिन जिह्वा गुण गाइ। तहँआदि पुरुष अलेख है, सहजैं रह्या समाइ ॥ 20 ॥ दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहाँ अजरा अमर उमंग। जरा मरण भौ भाजसी, राखै अपणे संग ॥ 21 ॥ जिज्ञासु उपदेश (सिंधी) दादू गाफिल छो वतें, मंझेइ रबु निहारि। मंझेइ पीव पाण जो, मंझेइ सु विचारि ॥ 22 ॥ दादू गाफिल छो वतें, आहे मंझि अलाह। पिरी पांण जो पाण सैं, लहै सभोई साव ॥ 23 ॥ दादू गाफिल छो वतें, आहे मंझि मकान। दरगह में दीवाण तत, पसेन बैठो पाण ॥ 24 ॥ दादू गाफिल छो वतें, अंदर पिरीं पसु। तखत रबाणीं बीच मैं, पे तिन्हीं वसु ॥ 25 ॥ परिचय साक्षात्कार हरि चिन्तामणि चिन्ततां, चिंता चित की जाइ। चिंतामणि चित में मिल्या, तहँ दादू रह्या लुभाइ ॥ 26 ॥ घी सो घोट = आत्म अभ्यास अपने नैनहुँ आप को, जब आतम देखै। तहँ दादू परमात्मा, ताही को पेखै ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू बिन रसना जहँ बोलिये, तहँ अंतरयामी आप । बिन श्रवणहुँ सांई सुनै, जे कुछ कीजे जाप ॥ 28 ॥ परिचय जिज्ञासु उपदेश ज्ञान लहर जहाँ थैं उठै, वाणी का परकास । अनुभव जहाँ थैं उपजे, शब्दैं किया निवास ॥ 29 ॥ सो घर सदा विचार का, तहाँ निरंजन वास । तहँ तूँ दादू खोजि ले, ब्रह्म जीव के पास ॥ 30 ॥ जहाँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार । अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥ 31 ॥ भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार । तहँ दादू निधि पाइये, निरंतर निरधार ॥ 32 ॥ एक ठौर सूझै सदा, निकट निरन्तर ठाउँ । तहाँ निरंजन पूरि ले, अजरावर तिहिं नाउँ ॥ 33 ॥ साधु जन क्रीला करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव । चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥ 34 ॥ दादू पसु पिरंनि के, पेही मंझि कलूब । बैठो आहे बीच में, पाण जो महबूब ॥ 35 ॥ नैनहुँ वाला निरखि करि, दादू घालै हाथ । तब ही पावै रामधन, निकट निरंजन नाथ ॥ 36 ॥ नैनहुँ बिन सूझे नहीं, भूला कतहूँ जाइ । दादू धन पावै नहीं, आया मूल गँवाइ ॥ 37 ॥ परिचय लै लक्षण सहज जहाँ आत्म तहाँ राम है, सकल रह्या भरपूर । अंतरगति लयौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 परिचय जिज्ञासु उपदेश पहली लोचन दीजिये, पीछे ब्रह्म दिखाइ । दादू सूझै सार सब, सुख में रहे समाइ ॥ 39 ॥ आंधी के आनन्द हुआ, नैनहुँ सूझन लाग । दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥ 40 ॥ दादू मिहीं महल बारीक है, गाँव न ठाँव न नाँव । तासों मन लागा रहै, मैं बलिहारी जाँव ॥ 41 ॥ दादू खेल्या चाहै प्रेम रस, आलम अंगि लगाइ । दूजे को ठाहर नहीं, पुहुप न गंध समाइ ॥ 42 ॥ नाहीं ह्वै करि नाम ले, कुछ न कहाई रे । साहिब जी की सेज पर, दादू जाई रे ॥ 43 ॥ जहाँ राम तहँ मैं नहीं, मैं तहँ नाहीं राम । दादू महल बारीक है, द्वै को नाहीं ठाम ॥ 44 ॥ मैं नाहीं तहँ मैं गया, एकै दूसर नाहीं । नाहीं को ठाहर घणी, दादू निज घर माहिं ॥ 45 ॥ दादू मैं नाहीं तहँ मैं गया, आगे एक अलाव । दादू ऐसी बंदगी, दूजा नाहीं आव ॥ 46 ॥ दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होइ । जब यहु आपा मिट गया, तब दूजा नाहीं कोइ ॥ 47 ॥ दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ । मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यूं था त्यूं ही होइ ॥ 48 ॥ दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं । दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥ 49 ॥ परिचय दादू तीन शून्य आकार की, चौथी निर्गुण नाम । सहज शून्य में रमि रह्या, जहाँ तहाँ सब ठाम ॥ 50 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 काया शून्य पंच का बासा, आत्म शून्य प्राण प्रकासा। परम शून्य ब्रह्म सौं मेला, आगे दादू आप अकेला ॥ 51 ॥ पाँच तत्त्व के पांच हैं, आठ तत्त्व के आठ। आठ तत्त्व का एक है, तहाँ निरंजन हाट ॥ 52 ॥ जहाँ मन माया ब्रह्म था, गुण इन्द्रिय आकार। तहँ मन बिरचै सबनि थैं, रचि रहु सिरजनहार ॥ 53 ॥ दादू जहाँ थैं सब ऊपजै, चंद सूर आकाश। पानी पवन पावक किये, धरती का प्रकाश ॥ 54 ॥ काल कर्म जीव ऊपजै, माया मन घट श्वास। तहँ रहता रमता राम है, सहज शून्य सब पास ॥ 55 ॥ सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं। तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥ 56 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, सो हंसा मोती चुणैं। पीवैं नीझर नीर, सो है हंसा सो सुणैं ॥ 57 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, जप तप संयम कीजिये। तहँ सनमुख सिरजनहार, प्रेम पिलावै पीजिये ॥ 58 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, संगी सबै सुहावणे। तहाँ बिन कर बाजै बैन, जिभ्या हीणे गावणे ॥ 59 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, चरण कमल चित लाइया। तहँ आदि निरंजन पीव, भाग हमारे आइया ॥ 60 ॥ दादू सहज सरोवर आतमा, हंसा करै कलोल। सुख सागर सूभर भऱ्या, मुक्ताहल मन मोल ॥ 61 ॥ दादू हरि सरवर पूरण सबै, जित तित पाणी पीव। जहाँ तहाँ जल अचंतां, गई तृषा सुख जीव ॥ 62 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 सुख सागर सूभर भर्या, उज्जवल निर्मल नीर। प्यास बिना पीवै नहीं, दादू सागर तीर ॥ 63 ॥ शून्य सरोवर हंस मन, मोती आप अनंत। दादू चुगि चुगि चंचुभरि, यौं जन जीवैं संत ॥ 64 ॥ शून्य सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव। दादू यहु रस विलसिये, ऐसा अलख अभेव ॥ 65 ॥ शून्य सरोवर मन भँवर, तहाँ कमल करतार। दादू परिमल पीजिए, सन्मुख सिरजनहार ॥ 66 ॥ शून्य सरोवर सहज का, तहँ मर जीवा मन। दादू चुणि चुणि लेयगा, भीतर राम रतन ॥ 67 ॥ दादू मंझि सरोवर विमल जल, हंसा केलि करांहि। मुक्ताहल मुक्ता चुगैं, तिहिं हंसा डर नांहि ॥ 68 ॥ अखंड सरोवर अथग जल, हंसा सरवर न्हाँहि। निर्भय पायाआप घर, अब उड़ि अनत न जांहि ॥ 69 ॥ दादू दरिया प्रेम का, तामें झूलैं दोइ। इक आतम परआतमा, एकमेक रस होइ ॥ 70 ॥ दादू हिण दरियाव, माणिक मंझेई। डुबि डेई पाण मैं, डिठो हंजेई ॥ 71 ॥ परआतम सौं आत्मा, ज्यूँ हंस सरोवर मांहि। हिलि मिलि खेलैं पीव सौं, दादू दूसर नांहि ॥ 72 ॥ दादू सरवर सहज का, तामें प्रेम तरंग। तहँ मन झूलै आत्मा, अपणे सांई संग ॥ 73 ॥ दादू देखौं निज पीव को, दूसर देखौं नांहि। सबै दिसा सौं सोधि करि, पाया घट ही मांहि ॥ 74 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू देखौं निज पीव को, और न देखौं कोइ। पूरा देखौं पीव को, बाहिर भीतर सोइ ॥ 75 ॥ दादू देखौं निज पीव को, देखत हि दुख जाइ। हूँ तो देखौं पीव को, सब में रह्या समाइ ॥ 76 ॥ दादू देखौं निज पीव को, सोई देखन जोग। परगट देखौं पीव को, कहाँ बतावैं लोग ॥ 77 ॥ परिचय जिज्ञासु उपदेश दादू देखु दयालु को, सकल रह्या भरपूर। रोम रोम में रमि रह्या, तूँ जनि जानै दूर ॥ 78 ॥ दादू देखु दयालु को, बाहरि भीतरि सोइ। सब दिसि देखौं पीव को, दूसर नाहीं कोइ ॥ 79 ॥ दादू देखु दयालु को, सनमुख सांई सार। जीधरि देखौं नैन भरि, तीधरि सिरजनहार ॥ 80 ॥ दादू देखु दयालु को, रोक रह्या सब ठौर। घट घट मेरा सांइयाँ, तूँ जनि जानै और ॥ 81 ॥ उभै असमाव तन मन नाहीं, मैं नहीं, नहीं माया, नहीं जीव। दादू एकै देखिए, दह दिसि मेरा पीव ॥ 82 ॥ दादू पाणी मांहीं पैसि करि, देखै दृष्टि उघारि। जलाबिंब सब भरि रह्या, ऐसा ब्रह्म विचारि ॥ 83 ॥ सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर। दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥ 84 ॥ दादू जहाँ तहँ साथी संग है, मेरे सदा अनंद। नैन बैन हिरदै रहै, पूरण परमानंद ॥ 85 ॥ जागत जगपति देखिये, पूरण परमानंद। सोवत भी सांई मिलै, दादू अति आनन्द ॥ 86 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल। चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥ 87 ॥ सूरज कोटि प्रकास है, रोम रोम की लार। दादू ज्योति जगदीश की, अंत न आवै पार ॥ 88 ॥ ज्यों रवि एक आकाश है, ऐसे सकल भरपूर। दादू तेज अनन्त है, अल्लह आली नूर ॥ 89 ॥ सूरज नहीं तहँ सूरज देख्या, चंद नहीं तहँ चन्दा। तारे नहीं तहँ झिलमिल देख्या, दादू अति आनन्दा ॥ 90 ॥ बादल नहीं तहँ बरषत देख्या, शब्द नहीं गरजंदा। बीज नहीं तहँ चमकत देख्या, दादू परमानन्दा ॥ 91 ॥ आत्म बेलीतरु दादू जोति चमकै झिलमिलै, तेज पुंज प्रकाश। अमृत झरै रस पीजिए, अमर बेलि आकाश ॥ 92 ॥ परिचय अंग दादू अविनाशी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप। सो हम देख्या नैन भरि, सुन्दर सहज स्वरूप ॥ 93 ॥ परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ। दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥ 94 ॥ निराधार निज देखिये, नैनहुँ लागा बन्द। तहँ मन खेलै पीव सौं, दादू सदा आनन्द ॥ 95 ॥ आत्म बेलितरु ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि। मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 96 ॥ परिचय हीरे हीरे तेज के, सो निरखै त्रय लोइ। कोइ इक देखै संत जन, और न देखै कोइ ॥ 97 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 नैन हमारे नूर मां, तहाँ रहै ल्यौ लाइ । दादू उस दीदार को, निसदिन निरखत जाइ ॥ 98 ॥ दादू नैनहुँ आगे देखिये, आत्म अंतर सोइ । तेज पुंज सब भरि रह्या, झिलमिल झिलमिल होइ ॥ 99 ॥ अनहद बाजे बाजिये, अमरापुरी निवास । जोति स्वरूपी जगमगै, कोइ निरखै निज दास ॥ 100 ॥ परम तेज तहँ मन रहे, परम नूर निज देखे । परम जोति तहँ आतम खेले, दादू जीवन लेखे ॥ 101 ॥ दादू जरै सु जोति स्वरूप है, जरै सु तेज अनंत । जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ 102 ॥ परिचय पति पहचान सतगुरु अलख अलाह का, कहु कैसा है नूर । दादू बेहद हद नहीं, सकल रह्या भरपूर ॥ 103 ॥ वार पार नहिं नूर का, दादू तेज अनंत । कीमत नहीं करतार की, ऐसा है भगवंत ॥ 104 ॥ निरसंध नूर अपार है, तेज पुंज सब मांहि । दादू जोति अनंत है, आगो पीछो नांहि ॥ 105 ॥ खंड खंड निज ना भया, एकलस एकै नूर । ज्यूं था त्यूं ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 106 ॥ परम तेज प्रकास है, परम नूर निवास । परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 107 ॥ परिचय साक्षात्कार नूर सरीखा नूर है, तेज सरीखा तेज । ज्योति सरीखी ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 108 ॥ तेज पुंज की सुन्दरी, तेज पुंज का कंत । तेज पुंज की सेज पर, दादू बन्या बसंत ॥ 109 ॥
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पुहप प्रेम बरसै सदा, हरि जन खेलैं फाग। ऐसा कौतुक देखिये, दादू मोटे भाग ॥ 110 ॥ परिचय रस अमृतधारा देखिए, पारब्रह्म बरषंत। तेज पुंज झिलमिल झरै, को साधु जन पीवंत ॥ 111 ॥ रस ही में रस बरषि है, धारा कोटि अनंत। तहाँ मन निश्चल राखिये, दादू सदा बसंत ॥ 112 ॥ घन बादल बिन बरषि है, नीझर निर्मल धार। दादू भीजै आत्मा, को साधु पीवनहार ॥ 113 ॥ ऐसा अचरज देखिया, बिन बादल बरषै मेह। तहँ चित चातक है रह्या, दादू अधिक स्नेह ॥ 114 ॥ महारस मीठा पीजिये, अविगत अलख अनन्त। दादू निर्मल देखिये, सहजैं सदा झरंत ॥ 115 ॥ परिचय कामधेनु कामधेनु दुहि पीजिये, अकल अनुपम एक। दादू पीवै प्रेम सौं, निर्मल धार अनेक ॥ 116 ॥ कामधेनु दुहि पीजिये, ताको लखै न कोइ। दादू पीवै प्यास सौं, महारस मीठा सोइ ॥ 117 ॥ कामधेनु दुहि पीजिये, अलख रूप आनन्द। दादू पीवै हेत सौं, सुखमन लागा बंद ॥ 118 ॥ कामधेनु दुहि पीजिये, अगम अगोचर जाइ। दादू पीवै प्रीति सूं, तेज पुंज की गाइ ॥ 119 ॥ कामधेनु करतार है, अमृत सरवै सोइ। दादू बछरा दूध को, पीवै तो सुख होइ ॥ 120 ॥ ऐसी एकै गाइ है, दूझै बारह मास। सो सदा हमारे संग है, दादू आतम पास ॥ 121 ॥
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 परिचय आत्मबली तरु तरुवर साखा मूल बिन, धरती पर नांही । अविचल अमर अनंत फल, सो दादू खांही ॥ 122 ॥ तरुवर साखा मूल बिन, धर अंबर न्यारा । अविनाशी आनन्द फल, दादू का प्यारा ॥ 123 ॥ तरुवर साखा मूल बिन, रज बीरज रहिता । अजरा अमर अतीत फल, सो दादू गहिता ॥ 124 ॥ तरुवर साखा मूल बिन, उत्पति परलै नांहि । रहिता रमता राम फल, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 125 ॥ प्राण तरुवर सुरति जड़, ब्रह्म भूमि ता मांहि । रस पीवै फूलै फलै, दादू सूखै नांहि ॥ 126 ॥ परिचय जिज्ञासु उपदेश (प्रश्न) ब्रह्म सुनि तहँ क्या रहै ? आतम के अस्थान ? काया अस्थल क्या बसै ? सतगुरु कहो सुजान ॥ 127 ॥ देह अध्यासियों के लक्षण (उत्तर) काया के अस्थल रहैं, मन राजा पंच प्रधान । पच्चीस प्रकृति तीन गुण, आपा गर्व गुमान ॥ 128 ॥ आत्म जिज्ञासु के लक्षण आतम के स्थान हैं, ज्ञान ध्यान विश्वास । सहज सील संतोष सत, भाव भक्ति निधि पास ॥ 129 ॥ ब्रह्मनिष्ठ के लक्षण ब्रह्म शून्य तहँ ब्रह्म है, निरंजन निराकार । नूर तेज तहँ ज्योति है, दादू देखणहार ॥ 130 ॥ अबुल फज़ल के प्रश्न मौजूद खबर, माबूद खबर, अरवाह खबर औजूद । मुकाम चिः चीज हस्त, दादनी सजूद ॥ 131 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 औजूद मकामे हस्त - देह अध्यासी के लक्षण नफ़्स गालिब किब्र काबिज, गुस्सः मनी एस्त । दुइ दरोग, हिर्स हुज्जत, नाम नेकी नेस्त ॥ 132 ॥ अरवाह मकामे हस्त - आत्मवादी के लक्षण इश्क इबादत बंदगी, यगानगी इखलास । मिहर मुहब्बत, खैर खूबी, नाम नेकी पास ॥ 133 ॥ माबूद मकामे हस्त - ब्रह्मवादी के लक्षण यके नूर खूबे खूबां, दीदनी हैरान । अजब चीज खुरदनी, पियालए मस्तान ॥ 134 ॥ मौजूद खबर (शरीयत - मंजिल) हैवान आलम गुमराह गाफिल, अव्वल शरीयत पंद । हलाल हराम नेकी बदी, दर्से दानिशमंद ॥ 135 ॥ तरीकत मंजिल कुल फारिग तर्क दुनिया, हररोज हरदम याद । अल्हः आली इश्क आशिक, दरूने फरियाद ॥ 136 ॥ मार्फत मंजिल आब आतश अर्श कुर्सी, सूरते सुबहान । शिरर सिफ़्त करद बूद, मारफत मकाम ॥ 137 ॥ हकीकत मंजिल हक हासिल नूर दीदम, करारे मकसूद । दीदार दरिया अरवाहे आमद, मौजूदे मौजूद ॥ 138 ॥ चारों मंजिलें चहार मंजिल बयां गुप्तम, दस्त करदः बूद । पीरां मुरीदां खबर करदः, जां राहे माबूद ॥ 139 ॥ पहली प्राण पशु नर कीजे, साच झूठ संसार । नीति अनीति भला बुरा, शुभ अशुभ निरधार ॥ 140 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 सब तज देखि विचार कर, मेरा नाहीं कोइ। अनुदिन राता राम सौं, भाव भक्ति रत होइ ॥ 141 ॥ दादू अंबर धरती सूर शशि, सांई, सब लै लावै अंग। यश कीरति करुणा करै, तन मन लागा रंग ॥ 142 ॥ दादू परम तेज तहँ मैं गया, नैनहुँ देख्या आइ। सुख संतोष पाया घणा, ज्योतिहिं ज्योति समाइ ॥ 143 ॥ अर्थ चार अस्थान का, गुरु सिष कह्या समझाइ। मारग सिरजनहार का, भाग बड़े सो जाइ ॥ 144 ॥ नमाज सिजदा अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चि कार। दादू नूर दादनी, आसिकां दीदार ॥ 145 ॥ आशिकां रहः कब्ज करदां, दिल वजां रफतंद। अलह आले नूर दीदम, दिल है दादू बंद ॥ 146 ॥ आशिकां मस्ताने आलम, खुरदनी दीदार। चंद दह चिः कार दादू, यारे मां दिलदार ॥ 147 ॥ ब्रह्म साक्षात्कार धारणा दादू दया दयालु की, सो क्यों छानी होइ। प्रेम पुलक मुलकत रहै, सदा सुहागनी सोइ ॥ 148 ॥ दादू बिगसि बिगसि दर्शन करै, पुलकि पुलकि रस पान। मगन गलित माता रहै, अरस परस मिलि प्राण ॥ 149 ॥ दादू देखि देखि सुमिरण करै, देखि देखि लै लीन। देखि देखि तन मन विलै, देखि देखि चित्त दीन ॥ 150 ॥ दादू निरखि निरखि निज नाम ले, निरखि निरखि रस पीव। निरखि निरखि पिव कौं मिलै, निरखि निरखि सुख जीव ॥ 151 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 परिचय स्मरण नाम पारख लक्षण तन सौं सुमिरण सब करैं, आत्म सुमिरण एक । आत्म आगै एक रस, दादू बड़ा विवेक ॥ 152 ॥ दादू माटी के मुकाम का, सब कोइ जाणै जाप । एक आध अरवाह का, बिरला आपै आप ॥ 153 ॥ दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै । निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥ 154 ॥ जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार । आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥ 155 ॥ तन सौं सुमिरण कीजिये, जब लग तन नीका । आत्म सुमिरण ऊपजै, तब लागै फीका ॥ आगै आपैं आप है, तहाँ क्या जी का । दादू दूजा कहन को, नाहीं लघु टीका ॥ 156 ॥ परिचय अंग चर्म दृष्टि देखै बहुत, आतम दृष्टि एक। ब्रह्म दृष्टि परचै भया, तब दादू बैठा देख ॥ 157 ॥ ये ही नैनां देह के, ये ही आत्म होइ । ये ही नैनां ब्रह्म के, दादू पलटे दोइ ॥ 158 ॥ घट परचै सब घट लखै, प्राण परचै प्राण । ब्रह्म परचै पाइये, दादू है हैरान ॥ 159 ॥ सूक्ष्म सौंज अरचा बंदगी दादू जल पाषाण ज्यों, सेवै सब संसार । दादू पाणी लूंण ज्यों, कोइ बिरला पूजणहार ॥ 160 ॥ नाम पारिख लक्षण अलख नाम अंतर कहै, सब घट हरि हरि होइ । दादू पाणी लूण ज्यों, नाम कहीजे सोइ ॥ 161 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 लै लक्षण सहज छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ। दादू ऐसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 162 ॥ सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ। दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥ 163 ॥ राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ। मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥ 164 ॥ जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और। देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥ 165 ॥ पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण। दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 166 ॥ तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण। जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 167 ॥ तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम। आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥ 168 ॥ नख शिख स्मरण कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ। मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥ 169 ॥ नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप। अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥ 170 ॥ अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि। सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥ 171 ॥ दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम। चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥ 172 ॥ दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत। अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥ 173 ॥
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