भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया। दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥ 239 ॥ दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया। जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥ 240 ॥ दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न। अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥ 241 ॥ आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ। साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥ 242 ॥ राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ। मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥ 243 ॥ लांबी भक्ति अगाध दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी। सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥ 244 ॥ दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध। इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥ 245 ॥ दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख। इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहै शेष ॥ 246 ॥ दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि। इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥ 247 ॥ दादू जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान। इन दोनों की मित नहीं, दादू नांही आन ॥ 248 ॥ सेवा अखंडित दादू जब लग राम है, तब लग सेवक होइ। अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवक सोइ ॥ 249 ॥ दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि। पावेगा तब करेगा, दादू सो परमाणि ॥ 250 ॥

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