सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 सांई सरीखा सुमिरण कीजे, सांई सरीखा गावै। सांई सरीखी सेवा कीजे, तब सेवक सुख पावै ॥ 251 ॥ परिचय करुणा विनती दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ। तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥ 252 ॥ दादू जे साहिब मानै नहीं, तऊ न छाडूं सेव। इहि अवलंबन जीजिये, साहिब अलख अभेव ॥ 253 ॥ सूक्ष्म सौंज अरचा बन्दगी आदि अंति आगे रहे, एक अनुपम देव। निराकार निज निर्मला, कोई न जाणे भेव ॥ 254 ॥ अविनासी अपरंपरा, वार वार नहीं छेव। सो तूँ दादू देखि ले, उर अंतर कर सेव ॥ 255 ॥ दादू भीतर पैसि कर, घट के जड़े कपाट। सांई की सेवा करै, दादू अविगत घाट ॥ 256 ॥ घट परिचै सेवा करै, प्रत्यक्ष देखै देव। अविनाशी दर्शन करै, दादू पूरी सेव ॥ 257 ॥ भ्रम विध्वंस पूजनहारे पास हैं, देही माहिं देव। दादू ताकौं छाड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥ 258 ॥ परिचय दादू रमता राम सौं, खेलैं अन्तर मांहि। उलट समाना आप में, सो सुख कतहूँ नाहिं ॥ 259 ॥ दादू जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव। उलट समाने आप में, अंतर नांही पीव ॥ 260 ॥ परगट खेलैं पीव सौं, अगम अगोचर ठांव। एक पलक का देखना, जीवण मरण का नांव ॥ 261 ॥
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