दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF ११४ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
विक्षिप्तक्षुत्पिपासादिखेदं च तमवधूतदुहितृप्रार्थनस्याङ्गराजस्योद्धरणा- याङ्गानभियास्यन्ननन्यविश्वासात्रिनाय । रुरोध च बलभरदत्तकम्प- श्चम्पाम् । ( १० ) चम्पेश्वरोऽपि सिंहवर्मा सिंह इवासह्यविक्रमः प्राकारं भेद- यित्वा महता बलसमुदायेन निर्गत्य स्वप्रहितदूतव्राताहूतानां साहाय्यदा-
महात्म्येन विक्षिप्तो दूरीकृतः क्षुत्पिपासादिखेदो यस्य तम् । तं राजवाहनम् । अवधूतेति-अवधूता तिरस्कृता दुहितुः कन्यायाः अम्बालिकायाः प्रार्थना येन तस्य । उद्धरणाय उन्मूलनाय । अङ्गान् अङ्गदेशान् । अनन्यविश्वासात् अन्यस्मिन् विश्वा- साभावात् । हेतौ पञ्चमी । बलभरेण सैन्यसमूहेन दत्तः कम्पो येन सः । चण्ड- वर्मणो विशेषणमेतत् । चम्पाम् अङ्गदेशराजधानीम् ।
( १० ) प्राकारं प्राचीरम् । बलसमुदायेन सैन्यसमूहेन । स्वप्रहितेति-स्वप्रहि- तेन स्वयं प्रेषितेन दूतव्रातेन दूतसमूहेन आहूतानाम् आकारितानाम् । साहाय्य-
तपस्या करनेवाले दर्पसारके समीप यह सारा वृत्तान्त कहला भेजा । तत्पश्चात् पुष्पोद्भवका सर्वस्व अपहरण कर लिया, उसे उसके कुटुम्बीसहित पकड़कर कारागारमें बन्द कर दिया तथा सिंहशावकके समान वीर राजवाहनको भी काष्ठके बने जंगलेदार पिंजड़ेमें बन्द कर दिया । यद्यपि उसे कई दिनोंसे कुछ खाने-पीनेको भी न मिला था तथापि उसे भूख-प्यास न लगी । उसका कारण यह था कि उसके केशोंमें एक चूडामणि छिपी थी जिसका प्रभाव यह था कि चाहे जितने दिनों भोजन वा जल न मिले परन्तु उक्त मणिको धारण किये रहनेसे वह व्यक्ति दुर्बल एवं व्याकुल नहीं हो सकता। यद्यपि उसने अतिकरुण स्वरमें दीनतासे चण्डवर्मासे प्रार्थना की कि 'यह राजपुत्री मुझे चाहती है और मैं भी इससे प्रेम करता हूँ, इस हेतु हम लोगोंके इस शुद्ध प्रेममें विघ्न न डालिये', परन्तु उसने कुछ न सुना । इसी समय सिंहवर्माको नष्ट करनेके लिए चण्डवर्माने उसके ऊपर आक्रमण कर दिया । अपने किसी भी दासपर विश्वास न करके वह चण्डवर्मा राजवाहनको भी युद्धमें जाते समय अपने साथ ही लेता गया । महाराज अंगराजकी राजधानी चम्पा नगरीको उसने जाकर चारों ओरसे घेर लिया ।
( १० ) मृगेन्द्रके समान असाधारण पराक्रमी चम्पेश्वर महाराज सिंहवर्माने भी अति- विशाल सेनाको साथ लेकर उसपर आक्रमण कर दिया । उन्होंने अपने बड़े प्रचण्ड आक्र- मणसे उसके चक्रव्यूहको अस्त-व्यस्त कर दिया और अतिवीरतासे सामना किया । इसी समय उन्होंने अपने राजके दूतोंके द्वारा आस पासके महाराजों को सहायता देनेके लिए कहला भेजा । इस कारण वे लोग भी तात्कालिक सहायता देने आ पहुँचे । परन्तु उन
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